भीतर गहराई से हम स्वतंत्र प्राणी हैं। लगभग। जन्म के समय हमारी स्वतन्त्रता का बोध कराने के लिए, हमें बंधन मुक्त करने को नाभि की नाड़ भी काट दी जाती है, , इसी तथ्य को दर्शाते हुए कि हमारा मूल संबंध स्वयं से होता है, न कि अन्यों से। कहीं न कहीं, उस प्रेम की खोज के दौरान भी जो कि हमारा सहारा बन सके, वास्तव में हम स्वतन्त्रता ही ढूंढ रहे होते हैं। किसी संबंध में हम जितनी अधिक स्वतन्त्रता अनुभव कर पाते हैं, उतना अधिक हम पूर्णता की अनुभूति करते हैं। मैंने लोगों को कहते हुए सुना है कि मैं इस पुरुष अथवा स्त्री से प्रेम करता हूँ, चूंकि इनके सानिध्य में मैं अपने सहज स्वभाव में रह सकता हूँ। सारांश में, हम जो कह रहे हैं वह यह कि मैं “स्वतन्त्रता” अनुभव करता हूँ जब भी मैं अपने प्रिय के साथ होता हूँ।

मैंने अक्सर निर्बाधित व निडरता से जीने पर बात की है। इसी प्रकार, मैंने ये कथन भी उतनी ही बार बोला है – “स्वयं से प्रेम करें”, “अपने सहज स्वभाव में रहें”। हाँ, एक तथ्य पर मैंने प्रकाश नहीं डाला, वह है – स्वतन्त्रता पर मेरे विचार। क्या स्वतन्त्रता का अर्थ है कि आप कभी भी कुछ भी कर सकते हैं? क्या आप अपनी स्वतंत्र चाल से चल सकते हैं,या चलना चाहिए, भले ही वह दूसरे व्यक्ति को कष्ट पहुंचा रही हो? इस प्रश्न का कोई सुनिश्चित उत्तर अथवा कोई मार्ग-निर्देशक नियम नहीं हो सकता। यह परिस्थिति-परक होता है। इतना कहने का उपरांत, अब मैं आपके साथ “स्वतन्त्रता” पर अपना दृष्टिकोण साझा कर सकता हूँ। चलिये इसका आरंभ मैं एक लघु-कथा से करता हूँ –

एक छ: वर्ष के बालक को कुछ समय के लिए अपने घर में अकेले रहना था। उसकी माँ ने जाने से पूर्व उसे अनेकानेक निर्देश दिये व हर प्रकार से उसे समझा बुझा कर तैयार कर दिया। उसने उसे रसोईघर व काँच के बर्तनों से विशेष रूप से दूर रहने को कहा। एक अच्छा बालक होने के नाते, वह मान गया व अपनी माँ को आश्वस्त किया कि उसने सब बातें समझ ली हैं।

किन्तु था तो वह एक नन्हा बालक ही, अतः वह स्वयं को उसी विषय पर सोचने से रोक न पाया जिसके लिए उसे मना किया गया था – अर्थात, रसोईघर में जाना! उसकी माँ के जाने के तुरंत बाद उसने फ्रिज़ में से दूध का जग निकाला और थोड़ा लेने की सोची। जब वह जग में से दूध उढेल रहा था तो जग के मुहाने पर दूध असामान्य ढंग से फैल गया, आधा दूध जग के चारों ओर फैलता जा रहा था व कुछ भाग ग्लास में आ रहा था। दूध को फैलने से बचाने के लिए उसने घबराते हुए जग को कुछ इस तरह कोण बनाते हुए मोड़ा कि उसके हाथ से पूरा जग ही छूट गया। अगले ही पल वह काँच का जग टुकड़े टुकड़े हो, जमीन पर पड़ा था व सारा दूध पूरे रसोईघर में फैल चुका था।

भयभीत हो, वह रसोईघर से बाहर भागा व वापिस अपने कमरे में चला गया। उसे पता था कि उसने सब कुछ बिगाड़ दिया है, किन्तु वह उसे पुनः ठीक करना नहीं जानता था। इस सब को छुपाने का कोई रास्ता न था । मन ही मन उसने बहुत से बहाने सोचे, यहाँ तक भी कि उसे तो इस घटना के बारे में कुछ मालूम ही नहीं। किन्तु, अंदर ही अंदर उसे पता था कि माँ को निश्चय दिलाना बहुत कठिन होगा।

माँ घर लौटीं, और, जैसे ही रसोईघर की हालत देखी, तो उन्होंने अपने बेटे को बुलाया। नन्हें बालक ने एक के बाद एक कई बहाने बनाए। उसने यहाँ तक कह दिया कि जब वह दूध डालने का प्रयास कर रहा था तो एक राक्षस ने उसे बहुत डराया। माँ कुछ देर तक उसे सुनती रहीं, फिर उन्होंने उसे कलाई से पकड़ा और प्यार से, हौले से, उसे अपने अंक में भींच लिया।

“हर कोई गलतियाँ करता है बेटा,” वह बोलीं। “सच्च में, हम सभी गलतियाँ करते हैं। और यह स्वाभाविक है। हम सब गलतियाँ करने में स्वतंत्र हैं। किन्तु, अपने कृत्यों का दायित्व भी हम पर ही है और हमें उसे शालीनता पूर्वक मानना भी चाहिए।”

उन्होंने उसे वह सब साफ करने में उनकी मदद करने को कहा और बोलीं, “यदि आप से जग टूट ही गया है तो आप को फर्श भी साफ करना चाहिए।”

मैं इसे ‘स्वतन्त्रता का मूल्य’ कहता हूँ। आप अपने जीवन में किस स्तर की स्वतन्त्रता का आनंद लेना चाहते हैं – इस तथ्य का सीधा संबंध आपके दायित्व स्वीकारने व संभालने की क्षमता से है। स्वतन्त्रता का मूल्य है – दायित्व। सत्ता, प्रतिष्ठा, धन-धान्य, शिक्षा इत्यादि द्वारा उपार्जित स्वतन्त्रता आपके कंधों पर उतना ही बड़ा दायित्व भी ले आती है। और, जितना अधिक आप जिम्मेदार हैं, उतनी अधिक स्वतन्त्रता आपको प्राप्त हो सकती है। नेल्सन मंडेला के शब्दों में, “स्वतन्त्रता का अर्थ मात्र जंजीरें तोड़ डालना नहीं होता, बल्कि इस तरह का जीवन जीना होता है जो दूसरों की स्वतन्त्रता को सम्मान देता हो व बढ़ाता हो।”

उदाहरण के लिए, स्वतन्त्रता यह नहीं कि चूंकि आप अधिक शक्तिशाली हैं, अतः किसी मन मुटाव की स्थिति में, आप दूसरे देशों पर बम्ब गिराएँगे। इसका यह अर्थ नहीं कि आप दूसरे व्यक्ति की अवमानना करेंगे, चूंकि आप ऐसा करने की स्थिति में हैं। मुक्त-भाष्य का अभिप्राय यह नहीं कि आप अपने मन में जो आए वह कह सकते हैं। स्वतन्त्रता, जहां एक विशेष सौभाग्य है, वहीं, वास्तव में, यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। वास्तविक स्वतन्त्रता सदा एक अनुशासित ढाँचे में ही विकसित होती है, इसमें सदा एक व्यवस्था होती है। बिना तय ढाँचे में ढली स्वतन्त्रता, भले ही वह व्यक्तिगत, सामाजिक, नैतिक अथवा कानूनी क्यों न हो, विनाशकारी है।

मैं विक्टर फ्रैंक की हृदय-स्पर्शी कृति – मैन’ज़ सर्च फॉर मीनिंग (Man’s Search For meaning), पढ़ कर रो पड़ा था। मैं डा॰ फ्रैंक के दर्शन पर आधारित एक लेख आने वाले समय में पृथक रूप से लिखूंगा। अभी के लिए, मैं स्वतन्त्रता पर उनका गूढ़ मत आपके साथ साझा करना चाहूँगा –

…तथापि, स्वाधीनता अंतिम शब्द नहीं। स्वाधीनता कहानी का एक हिस्सा मात्र है व अर्ध-सत्य है। स्वतन्त्रता उस सम्पूर्ण दृश्य प्रपंच का नकारात्मक पहलू है जिसका सकारात्मक पहलू है – उत्तरदायित्व। सही मायने में कहा जाये तो स्वतन्त्रता पर निरंकुशता के रूप में विघटित होने का खतरा मंडरा रहा है, यदि इसे ज़िम्मेदारी के रूप में न समझा व जिया गया। यही कारण है कि मेरी संस्तुति है कि यदि पूर्व के छोर पर स्टेचू ऑफ लिबेर्टी है तो पश्चिम छोर पर स्टेचू ऑफ रेस्पॉन्सिबिलिटी स्थापित कर उसे संपूरित किया जाये…

…चूंकि ‘आस्च्र्वट्ज़’ के समय से हम जानते हैं कि मानव क्या क्या कर सकता है, और, ‘हिरोशिमा’ के समय से यह कि क्या क्या दांव पर है।

यदि हम ऐसे समय भी रसोईघर में घुसना चाहते हैं जिस समय हमसे यह आपेक्षित नहीं, तो बेहतर होगा कि हम जग को उचित ढंग से पकड़ना सीखें। और, यदि गलती से हम जग तोड़ दें, तो हमें ज़िम्मेदारी लेनी होगी और सब ठीक ठाक करने की दिशा में कदम उठाना होगा।

हमारी स्वतन्त्रता का क्या औचित्य यदि हम उसका उपयोग किसी के अनुरक्षण के लिए न करें, उन्हें यह आभास न करा पाएँ कि आपसे भी कोई प्रेम करता है? हमारी ऐसी स्वतन्त्रता का क्या औचित्य यदि हम उसका उपयोग दूसरों को कष्ट व पीड़ा पहुंचाने के लिए मात्र इसलिए करें चूंकि हम ऐसा करने की स्थिति में हैं? वास्तविक स्वतन्त्रता तो सद्भाव की अनुभूति है। और किसी संबंध में अथवा समाज में, सद्भाव तब तक निष्पादित नहीं हो सकता, जब तक हम ज़िम्मेदारी से बोलते, व्यवहार व कार्य नहीं करते।

एक व्यक्ति किसी फॉर्च्यून ५०० कंपनी में वरिष्ठ प्रबन्धक के पद हेतु साक्षात्कार के लिए गया।

“हमें ‘सम्पूर्ण’ एवं ‘समाप्त’ में अंतर समझाएँ”, साक्षात्कारकर्ता ने पूछा।
यह एक घुमावदार प्रश्न था, चूंकि ऐसा हो सकता है कि नियत कार्य पूर्ण होकर भी समाप्त न हुआ हो, अथवा, कार्य समाप्त तो हो गया किन्तु अभी अपूर्ण ही है।
औपचारिक मैनेजमेंट भाषा की लीक से हट कर उसने उत्तर दिया, “यदि आप सही स्त्री से विवाह करते हैं तो आप ‘सम्पूर्ण’ हैं। यदि आप गलत से विवाह करते हैं तो आप ‘समाप्त’ हैं।”

उसे वह नौकरी मिल गई। संक्षेप में यही स्वतन्त्रता है। जब आप अपनी स्वतन्त्रता का उचित उपयोग करते हैं तो यह आपको सम्पूर्ण बनाती है, यह आपको एक अति उत्तम गंतव्य तक पहुंचाती है। और, जब आप स्वतन्त्रता की आड़ में लापरवाही व अविवेक को छुपाते हैं तो आप स्वतन्त्रता के मूल को ही छिन्न-भिन्न कर देते हैं। आप संपूर्णता का आभास नहीं कर पाते। वरन, आप बेचैनी अनुभव करते हैं, और, कदाचित, कुंठा भी।

स्वतन्त्रता का स्वरूप यह नहीं कि “मुझे-परवाह-नहीं-अथवा-जो-हो-सो-हो”, यह अज्ञान है। वास्तविक स्वतन्त्रता है “मैं-जानता-हूँ-कि-क्या-क्या-दाँव-पर-है-और-इसलिए-मैं-तदनुरूप-कार्य-करूंगा”।

जिम्मेदार बनें, स्वतंत्र बनें।

शांति।
स्वामी