एक समय की बात है एक यात्री बहुत उदास और परेशान सा अपनी दुनिया में खोया हुआ एक घने वन से जा रहा था। उसे लग रहा था कि उसका समग्र जीवन संघर्षमय रहा था। उसके सभी मित्र, सहकर्मचारी एवं भाई-बहन प्रगति कर चुके थे, किंतु वह जहाँ था वहीं का वहीं रह गया था। उस को मन ही मन लगने लगा था कि अन्य सब ही लोग बड़े ही भाग्यशाली थे परंतु उस के भाग्य में केवल कड़ा श्रम ही लिखा था।

वास्तव में वह एक जादुई वन से जा रहा था, किंतु स्वयं इस बात से अवगत नहीं था। एक विशाल वृक्ष जो की अति भव्य, अति सुन्दर, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता हो, वन के एकदम बीचोबीच खड़ा था – बहुत ही लुभावना एवं आकर्षक। वह था एक कल्पतरु – मन की इच्छाओं की पूर्ति करने वाला वृक्ष। यात्री वृक्ष की छाँव में बैठ गया। शीघ्र ही उसे प्यास लगी। उसने कामना की, “कहीं से थोड़ा शीतल जल पीने को मिल जाता तो कितना अच्छा होता”। और यह क्या, हवा में से एक शीतल जल का प्याला उभर के उसके सामने आ गया!

वह एक ही घूँट में सारा पानी पी गया, पर अब उसे भूख भी लगी थी। उसके मन में भोजन का विचार उठा ही था कि उसके सामने एक वैभवशाली भोजन की थाली उपस्थित हो गयी! कहीं कोई सपना तो नहीं देख रहा है, उसने स्वयं को विश्वास दिलाने के लिए अपने आप को एक चिकोटी काटी! उसने एक आरामदेह बिस्तर का विचार किया, और उसकी वह इच्छा भी पूर्ण हो गयी। यात्री को स्पष्ट हो गया कि उसके हाथों कोई बहुत बहुमूल्य वस्तु लग गयी है। उसकी हर एक सोच वास्तविकता में परिवर्तित हो रही थी। उसने स्वयं के लिए घर, नौकर-चाकर, बागीचा, भूमी, धन की इच्छा की और वे सब कुछ ही उस के सामने उपस्थित होने लगे।

वह सोचने लगा कि वह स्वयं ही अपने आप का भाग्यविधाता बन गया था। और वह वृक्ष वास्तव में ही उसकी हर इच्छा पूर्ण कर रहा था। उसके अपने हर विचार सच सिद्ध हो रहे थे। अब उसे यह सब कुछ खो देने का भय लगने लगा, और यह नकारात्मक मानसिकता के साथ उसने सोचा, “नहीं, यह सच नहीं हो सकता। मैं इन सब के योग्य ही नहीं हूँ। मैं इतना भाग्यशाली हो ही नहीं सकता। अवश्य ही यह कोई स्वप्न होगा।”

और यह क्या! पल भर में सब कुछ अदृश्य हो गया। उसने चारों दिशाओं में देखा तो केवल घनघोर वन के अतिरिक्त कुछ नहीं था। अब संध्या होने लगी थी। अंधेरा हो रहा था; उस को एक भय लगने लगा। “आशा करता हूँ कि यहाँ आसपास कोई शेर ना हो, नहीं तो मुझे जीवित ही खा जायेगा”, उसने सोचा।

और तुरंत ही वहाँ एक शेर आया और उसे खा गया।

यह बोधकथा हर एक की कहानी है। हम सब एक वन में यात्रा कर रहे हैं और यही सोचते रहते हैं कि अपना जीवन क्या हो सकता था और क्या होना चाहिए था। परंतु ऐसा सोचते-सोचते हम इस बात को भूल जाते हैं कि हमारा संसार वास्तव में पहले से ही कितना भव्य और अद्भुत है।

आप एक रहस्यमय वृक्ष के नीचे आराम कर रहे हैं, कईं बार आप को इस बात का पता भी नहीं चलता कि वह आप की इच्छाओं की पूर्ति कर रहा होता है, कि आप के सपने सच हो रहे होते हैं, कि यह ब्रह्माण्ड आप को सदा सुन रहा होता है। और इस श्रोता की सुंदरता यह है कि वह पूर्ण रूप से आलोचना-मुक्त हो कर सुनता है। वह आप की अच्छी और बुरी इच्छाओं में कोई भेद नहीं करता। आप किसी एक विषय पर लम्बे समय तक विचार करते रहते हैं, तो ब्रह्माण्ड में उस बात की स्वीकृति हो जाती है और फिर प्राकृतिक शक्ति आप के जीवन में उस के साक्षात्कार की व्यवस्था करने लगती है।

यदि आप के प्रयत्न नेक एवं हार्दिक हों, तो आप की इच्छा की प्रबलता तथा आप के विचारों की शुद्धता – यह दो मुख्य पहलू हैं जो यह निश्चित करते हैं कि आप की इच्छा कितनी जल्दी पूर्ण होगी। विचारों की शुद्धता द्वारा मैं कोई नैतिकता के विषय में बात नहीं कर रहा हूँ, मैं तो केवल आप अपनी इच्छा के लिए कितने एकनिष्ठ हैं उसकी बात कर रहा हूँ। यदि आप के मन में एक ही समय पर बहुत सारी इच्छायें दौड़ रहीं हों, तो वह केवल एक शोर मात्र होगा। एक समय पर केवल एक ही विषय पर ध्यान दें।

सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि जब आप किसी बात पर विश्वास नहीं करते तब ब्रह्माण्ड भी उस बात में विश्वास नहीं करता। किंतु जो आप अपने ध्येय में, स्वप्नों में, इच्छाओं में और आशा में विश्वास रखते हैं तब ब्रह्माण्ड भी उसमें अपना विश्वास रखता है। वैदिक ग्रंथों में भी बहुत आग्रह के साथ यह बात कही गयी है और उसे पूर्ण तर्क के साथ सिद्ध भी किया गया है कि हम बिलकुल ब्रह्माण्ड की प्रतिकृति के जैसे ही बने हुए हैं। हम एक लघु ब्रह्मांड हैं और जो बाहर है वह एक गुरु ब्रह्माण्ड है। जो कुछ भी आप बहार के विश्व में वास्तविक स्वरूप में देखना चाहते हैं तो सर्व प्रथम आप को उसे अपने आंतरिक विश्व में प्रगट करना सीखना पड़ेगा – और वह भी एक दृढ़ विश्वास तथा पूरी प्रामाणिकता के साथ।

यदि आप धैर्यवान, उद्यमी एवं सकारात्मक रहना पसंद करेंगे तो आप अधिकतर सब कुछ प्राप्त कर पाएंगे। हालांकि यहाँ मुझे आप को एक चेतावनी देनी पड़ेगी – यदि आप किसी विशेष व्यक्ति को अपने जीवन में किसी विशेष माध्यम से प्राप्त करना चाहते हैं तो वहाँ प्रकृति का यह नियम काम नहीं करता। जैसे कि जो आप को प्रेम चाहिए, तो वह आप को मिलेगा, पर यह आवश्यक नहीं कि वह प्रेम आप को जिस व्यक्ति से चाहिए उस ही से मिले। ऐसा क्यों? क्योंकि उन लोगों की भी इच्छाएं एवं विचार ब्रह्माण्ड में बह रहे होते हैं, और यदि उनकी इच्छाएं और विचार अधिक प्रबल एवं सतत हों तो ब्रह्माण्ड को सबसे पहले उनको सुनना पड़ता है।

आप का भय, विचार, इच्छाएं, अपेक्षाएं, सपने एवं आशाएं – वे सभी एक विचार में से उत्पन्न होते हैं। और आप इनमें से जिस किसी के साथ भी चिपके रहते हैं वही अंत में प्रगट होता है।

कभी भी यह ना सोचें कि आप अपने जीवन में अच्छी वस्तु पाने के योग्य नहीं हैं, कभी भी यह ना मान लें कि आप कुछ सिद्ध नहीं कर सकते, क्योंकि यदि जो आप ऐसा सोचने लगेंगे, तो फिर प्रकृति के लिए भी आप पर विश्वास करने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं रह जाता। आप के सपनों को सच्चाई में बदलने दें; अपने भय के स्थान पर अपनी आशाओं को एक अवसर दें, आप की दृढ़ मान्यताओं को अपनी शंकाओं पर विजय प्राप्त करने दें।

आप को प्रसन्न रहने का, जीवन को पूरी तरह जीने का तथा इस आनंदमय जादुई पथ पर चलने का संपूर्ण अधिकार है। और यह कोई प्रेरणादायक वाक्य मात्र नहीं है, मेरी दृढ़ मान्यता है। वास्तव में, यह स्वामी की जीवन जीने की रीत है।

शांति।
स्वामी