यह बीते वर्ष, अप्रैल मास के आसपास का समय था, कदाचित अप्रैल का आरंभ ! चारों ओर पर्वत शिखर अभी भी हिमाच्छादित थे। जहां मैं था, वहाँ का तापमान, लगभग सम्पूर्ण दिवस, अधिकांश रूप से शून्य से भी नीचे ही रहता था। किन्तु, केवल कुछ स्थानों को छोड़ कर जहां की बर्फ कठोर हो चुकी थी, लगभग पूरी बर्फ पिघल चुकी थी। वह कठोर बर्फ न तो हिम समान थी, न ही बर्फ जैसी; इन दोनों के मध्य का कोई रूप था। शीत ऋतु में लगभग सभी वन्य जीव निचले, बिना बर्फ वाले स्थलों पर आ जाते हैं। वर्ष के इस समय मात्र मेरा स्थान ही बिना बर्फ का सर्वाधिक ऊंचा स्थल था। इसी कारण वन्य प्राणियों की संख्या – मुख्य रूप से भालू, वाराह (बनैला सूअर), हिरण व लंगूर – अपेक्षाकृत बढ़ गई थी।

यदा कदा मैं दोपहर के समय कभी बाहर आता तो, प्रायः, मृग इत्यादि को कुछ ही दूरी पर खेलते हुए देखता। मानव झलक मात्र से वे सरपट दौड़ वहाँ से गायब हो जाते थे, जिससे यह समझ आता है कि वे हमारी प्रजाति से कितना भयभीत रहते हैं; आशा करता हूँ कि वे हमें घृणा न करते हों ! मेरी कुटिया एक बड़े मैदान के समीप थी, एक 9 बिन्दु वाले गोल्फ कोर्स से मिलता जुलता स्थान, जहां कुछ विशाल वृक्ष थे, व चारों ओर घना जंगल फैला हुआ था। अप्रैल मास आरंभ होते ही वहाँ आप सैकड़ों वानरों को नवपल्लवित, कोमल पुष्प तोड़ते हुए देख सकते थे, जो पूरे मैदान में बिखरे होते, और वे उन्हें बड़े रोचक ढंग से खाते थे। वे नन्हे नन्हे पुष्प, लाल, नीले, गुलाबी व पीत वर्ण थे, किन्तु उन वानरों को मुख्य रूप से पीतवर्ण पुष्प ही भाते।

यदि मैं उनकी ओर लगभग तीन सौ मीटर की दूरी से भी हाथ का इशारा करता तो वे तुरंत सहम कर पास के वृक्षों की डालों पर झूलने लगते। यदि आप कुछ आगे जाते तो वे पारंगत नट, घने वन की ओर प्रस्थान करने लगते। किन्तु, अन्य जीव जंतुओं के प्रति उनके मन में लेश मात्र भी प्रेम न था। वहाँ कहीं भी पक्षियों का एक भी घोंसला नहीं था, चूंकि ये घोर उत्पाती वानर उन्हें तहस नहस कर देते थे। ये हर पल इधर से उधर कूदते फाँदते रहते, बिलकुल प्रतिबंधित मन की तरह जो एक विचार से दूसरे विचार पर झूलता रहता है, कभी भी गिरे बिना, हारे बिना।

एक दिन मैं वन की दूसरी ओर टहलने निकल गया। मेरी कुटिया से लगभग दो-तीन सौ मीटर दूर एक अन्य उजाड़ झोंपड़ी थी। उसके चारों ओर लंबी, जंगली घास उग आई थी। उसका टूटा फूटा, पुरानी घासफूस का छप्पर लगभग ६० डिग्री के कोण पर झुका हुआ था। बीते वर्षों में गाँव वालों ने उस झोंपड़ी के किवाड़ निकाल लिए थे, व अन्य काम में आने वाली लकड़ी भी ले गए थे, केवल बेकार सामान वहाँ छोड़ गए जो किसी भी काम का नहीं था। हिमपात के दिनों में उस झोंपड़ी के चारों ओर भालू के पद चिह्न दिखाई देना आम बात थी, साथ ही अन्य खुर के निशान भी। बनैले सूअर अक्सर अपने सींग बर्फ में गाड़ देते और तेज दौड़ लगाते, जिससे बर्फ पर चारों ओर लंबी लंबी लकीरें खिंच जातीं। हिरण शायद रात भर इधर उधर चहल कदमी करते होंगे। मैं नीचे निगाह किए, अपने ईष्ट के भाव में निमग्न, वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए उस झोंपड़ी की दिशा में जा रहा था।

जैसे ही मैंने अपने नेत्र ऊपर की ओर किए, मुझसे केवल पाँच मीटर दूर, एक अति सुंदर हिरणी खड़ी थी। बचपन में मैंने चिड़ियाघर में हिरण देखे थे, किन्तु इस तरह एकदम अपने सम्मुख खुले मैदान में अपने इतने समीप उसे देखने का अनुभव स्वयं में दिव्य था। मेरे होंठ विस्मय से हल्के से खुले ही रह गए, मेरा कंठ अवरुद्ध हो गया, और मेरे पग मानो वहीं, उसी मार्ग पर, जम से गए। वैसे, गहन-ध्यान का अभ्यासी तो मैं था, किन्तु यहाँ मैं एक अति रमणीक, अबोध हिरण के सम्मुख पूर्ण रूप से मंत्र-मुग्ध ऐसे खड़ा था कि मानो वह अपना श्रेष्ठ योगिक कौशल स्थिरता व विशुद्धता द्वारा, अति सहजता से मेरे समक्ष सिद्ध कर रही हो! आँखें कभी झूठ नहीं बोलतीं। वह अपनी बड़ी बड़ी, कोमल, करुणामयी आँखों से मुझे देख रही थी। हम दोनों में से कोई भी हिला नहीं। मैं वहाँ खड़ा उसे निहारता रहा। वह देखने में गर्भवती लग रही थी। मुझे लगा कि वह तुरंत वन की ओर दौड़ जाएगी, किन्तु वह बिना हिले डुले, अपलक, वहीं खड़ी रही। उसकी छोटी सी श्वेत पूँछ जो अति सुंदर रूप में मुड़ी हुई थी; एकदम चौकस कान, उसका लंबा चेहरा जो एक नाक व उन दो आकर्षक आँखों से सुसज्जित था, उसे स्वर्ग से उतरा कोई जीव दर्शा रहे थे।

कुछ और समय यूँ ही बीत गया, मैं नहीं जानता कितने सेकंड, और उसने अपना मुख कुछ अंदर की ओर मोड़ लिया – अपने उदर के समीप। कभी वह अपने पेट की ओर देखती तो कभी उस टूटी फूटी झोंपड़ी को, किन्तु इस पूरे प्रकरण में उसने अपनी दृष्टि मेरे पर से नहीं हटाई। उस मुद्रा में वह कुछ अधिक समय तक रही। मुझे ऐसा लगा मानो वह मुझसे बात कर रही हो, वह कह रही थी, “कितने यत्न से मैंने यह सुरक्षित स्थान ढूंढा था – अपने मृगशावक के जन्म हेतु, चूंकि जंगल में वह सुरक्षित नहीं रह पाता। जंगली वानर, भालू व बनैले सूअर इस नन्हे शावक के लिए खतरा हैं। किन्तु तुम (मनुष्य) यहाँ भी आ गए। अब तुम ही बताओ कि मैं और कहाँ जाऊँ? अब मैं क्या करूँ?”

मुझे उस पर बहुत दया उमड़ी व यह सोच कर बुरा लगा कि मैंने उसके सुरक्षित स्थान पर भी धावा बोल दिया था। मन ही मन मैंने उसे कहा कि मैं फिर कभी इस स्थान पर नहीं आऊँगा, वो यहाँ सुरक्षित ही है। किन्तु, मैं नहीं जानता कि उसने मेरे विचारों को समझा या नहीं, मेरी मंशा को जाना या नहीं। मैं पुनः उस ओर कभी नहीं गया। हमारी यह भेंट कदाचित कुछ मिनट तक चली, और, अंततः, वह चुपचाप, धीरे धीरे पग रखते, अति मनोहर चाल से, जंगल की ओर बढ़ चली। उसकी पतली पतली टाँगें जो पूर्ण तालबद्धता में हिल रहीं थीं, उसकी चाल को असाधारण रूप से मदमस्त बना रही थीं।

मैं अपनी कुटिया में लौट आया और विचार करने लगा कि हमने अपनी धरती माता कि क्या हालत बना दी है! यदि हम ध्यान दें तो विगत दस हजार या उससे अधिक वर्षों में, हमने इस पृथ्वी का दोहन कर इसे बदलने व नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यदि मनुष्य, प्रकृति के परिमाप पर कार्य कर रहा होता तो अब तक तो पृथ्वी समाप्त हो चुकी होती। और यदि प्रकृति भी हम मनुष्यों की भांति असहिष्णु होती, तो हमारी प्रजाति कब की लुप्त हो चुकी होती।

यदि आप प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं के उपयोग में सावधानी बरतें; वही लें व उतनी मात्र में ही लें जो जितना आवश्यक हो तो आप की हर आवश्यकता की पूर्ति होती रहेगी। तथापि, विनाश के वर्तमान स्तर का विचार करें तो क्या यह आशा की जा सकती है कि पृथ्वी पर जीवन चिरस्थाई रह पाएगा?

जैसा कि कहा जाता है – हम सब के लिए एक विश्व पर्याप्त है। एक निर्मल-विशुद्ध अंतर्जगत ही एक सुंदर-शालीन बाह्य जगत की रचना कर पायेगा। अन्तर्मन में करुणा का भाव बाह्य जगत में सुख का प्रदाता होता है; मन की निर्मलता बाह्य जगत को दिव्य-प्रशांत बना देती है। मनुष्य जाति प्रकृति से सदा सदा पाने की उत्तराधिकारी नहीं, हम प्रकृति से केवल ऋण-स्वरूप में कुछ पाते हैं।

मेरी इच्छा मात्र आप सब के साथ अपना अनुभव साझा करने की थी। आप अपने लिए यथायोग्य संदेश स्वयं हो समझ लें।

शांति।
स्वामी