मेरे पास रहने के लिए एक छोटी सी कुटिया है। यह भली प्रकार से सुसज्जित है। इसमें लकड़ी के दरवाजे हैं, दीवारें प्लास्टर की हुई हैं व साथ में एक स्नानघर भी है। इसमें एक 5 फुट लंबी व 5 फुट चौड़ी खिड़की भी है। एक प्रकार से यही मेरे व बाह्य जगत के मध्य की कड़ी है। दिन के 24 घंटों में से लगभग 22 घंटे या इससे भी अधिक समय मैं अपनी छोटी सी दुनिया में ही बिताता हूँ। मैं यहीं बैठ कर लिखता हूँ, ध्यान एवं जप व अन्य सभी क्रिया कलाप सम्पन्न करता हूँ। मैं इसी कुटिया में बैठ कर अपनी आराध्य देवी से वार्तालाप करता हूँ। आप मुझे विक्षिप्त की संज्ञा भी दे सकते हैं, यदि ऐसा करने से आपका कुछ लाभ होता हो, व आपको एक उत्तम व्यक्ति बनाने में यह मदद करता हो तो मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं। मुझे नहीं पता कि मैं अपने जगत का वर्णन किन शब्दों में करूँ; तर्क व बुद्धि की ही भांति, भाषा भी अक्षम व अपूर्ण प्रतीत होती है।

कल रात ओलावृष्टि व तत्पश्चात वर्षा भी हुई। कुछ समय शांत रहने के पश्चात पुनः, कभी ओलावृष्टि तो कभी वर्षा होती रही। आकाश अत्यंत गहन रात्रि के अंधकार से आच्छादित था, एक गहरी कालिमा की खाई के समान। मेरी कुटिया की टिन की छत पर वर्षा की बूंदों का रुंझुन स्वर प्रातः काल के शांत वातावरण को मानो हिलाडुला कर जगा रहा था। बाहर अभी भी घोर अंधकार ही था। हिमालय के जंगलों में अपने ध्यान में बिताए समय के दौरान मैं शाम के सात बजे से ले कर प्रातः चार बजे तक ध्यान में निमग्न रहा करता था; वस्तुतः सम्पूर्ण रात्रि का ध्यान। कुछ समय का अवकाश ले कर, पुनः प्रातः नौ बजे से छः घंटे के लिए मेरा ध्यान का समय रहता था। प्रातः चार बजे से नौ बजे तक के पाँच घंटे मैं अन्य सभी कार्यों में लगाता था; जिसमें सोना, भोजन करना, यज्ञ व अग्नि पूजन करना इत्यादि शामिल थे। आज पुनः, प्रातः काल के चार बजे का समय था।

किन्तु, आज मैं किसी निर्जन वन के एक सुदूर स्थान पर किसी एकांत कोने में नहीं था, बल्कि अपनी लोई में लिपटा, वर्षा की बूंदों का मधुर गान सुन रहा था एवं अन्तःकरण की दिव्य अनुभूति व बाह्य गर्माहट मेरे वर्तमान को सम्पूर्ण बना रहे थे। अपने बिस्तर पर लेटे हुए ही मैंने बाहर का दृश्य देखने के लिए खिड़की से पर्दा हटा दिया। बाहर पूर्ण अंधकार था, कुछ भी दृश्यमान नहीं था – मानो इस मायावी संसार ने अपना वास्तविक स्वरूप उजागर कर दिया हो। मैंने पर्दे को पुनः फैला दिया। अपने सिर पर एक पक्की छत पा कर मैं कृतकृत्य अनुभव कर रहा हूँ। यहाँ छत से पानी नहीं टपक रह था, आसपास चूहे व मक्खियाँ नहीं थे, न कोई मकड़ी, न कीट पतंगे, और न ही भिंड आदि थे। मैं अपनी रज़ाई में भली प्रकार से लिपटा हुआ था, हॉटडॉग के भीतर सॉस की तरह। मेरे मुख पर बर्फीली हवाओं के थपेड़े भी नहीं पड़ रहे थे।

इस कुटिया पर टिन की एक नई छत है, उस जंगल की पुरानी टूटी फूटी झोंपड़ी की छत से कहीं बेहतर, जहां से जब तब बिन बुलाये सजीव मेहमान, कीट-पतंगों के रूप में सीधे मेरे ऊपर गिरते रहते थे। यहाँ मैं एक स्वच्छ बिस्तर पर लेटा था। आसपास की दीवारों से पानी नहीं रिस रहा था। मैं अपनी टांगें पूरी लंबी कर के सो सकता था। वहाँ हिमालय में इतनी ठंड होती थी कि पूरी टांगें खोलना संभव नहीं था; आपको अपने को सिकोड़ कर ही सोना पड़ता था। मुख्यतः इसलिए चूंकि वहाँ मैंने अग्नि का प्रयोग मात्र एक घंटे के नित्य यज्ञ के उपरांत ही किया, अन्यथा कभी नहीं। जिस तारपोलीन का उपयोग उस टूटी फूटी झोंपड़ी की छत को ढांकने में किया गया था, वह भी बर्फबारी व तेज आँधी में पूर्ण रूप से अनुपयुक्त हो जाती थी, वैसे ही जैसे अनुभवातीत दिव्य ज्ञान के सम्मुख कोई शुष्क तर्कपूर्ण रचना! बृहद हिमालय के कठोर व कष्टकारी मौसम के सम्मुख तारपोलीन को उड़ने से बचाने के लिए रखी उन छोटी छोटी शिलाओं का कोई अस्तित्व ही नहीं था। सुनम्यता व दृढ़ता के योग से महान शक्ति का स्वाभाविक उद्भव होता है, तभी तो हवाओं में इतनी प्रचंड गति समाई रहती है – ऐसी मेरी सोच है।

मैंने एक बटन दबाया और रौशनी हो गई। वाह! क्या नायाब अनुभव है, मैंने सोचा। इन कुछ क्षणों ने मेरे अठारह मास के उन अनुभवों को समेट कर मुझे स्मरण दिला दिया जब मैं टॉर्च को दांतों द्वारा पकड़े रहता था ताकि दोनों हाथों से अपने अन्य कार्य कर पाऊँ, और यहाँ देखो, आज बस एक बटन दबाया व पूरा कक्ष प्रकाशमान हो गया! मैंने स्नानगृह का किवाड़ खोला, यह आराम से खुलता व बंद हो जाता है क्योंकि इसे कब्जों से जोड़ा गया है। वहाँ जंगल में ऐसा कोई द्वार न था, बस एक लकड़ी का टुकड़ा द्वार की भांति प्रयोग में आता था। आज मुझे ऐसा प्रतीत हो रह है मानो इन सब सुविधाओं के मध्य मैं किसी आश्चर्यलोक में हूँ। तथापि, यह एक तुच्छ सा अनोखा स्थान ही तो है, मेरे अन्तःकरण के उस दिव्य, एकात्मक अलौकिक लोक की तुलना में!

किसी वस्तु के अभाव में ही उसका उचित मूल्य व महत्व अनुभव होता है।

यहाँ, जरा विचारें कि कैसे बहुदा, बहुत कुछ, साधारण मात्र मान लिया जाता है। अपने श्वासों पर ही ध्यान दें। यह कितने अनमोल हैं। आपका यह जीवन कितना मूल्यवान है। और यह क्षण, यह वर्तमान का क्षण, अभी, इसी समय – कितना अनूठा है। सदा कृतज्ञ भाव से परिपूर्ण रहें। मैं तो हूँ। अत्यंत कृतार्थ।

हरे कृष्ण।
स्वामी