हाल ही में मुझे उन सब लोगों से, जो मेरे लिए चिंतित हैं, ढेरों ई-मेल प्राप्त हुए। उनमें से कुछ दुखी थे, कुछ हैरान-परेशान थे व कुछ तो अत्यधिक क्रोध में थे (मुझ पर नहीं)। कारण? अपने उस प्रिय व्यक्ति को ले कर सुनी कुछ बेबुनियाद अफवाहें, जिसे वे अतिशय प्रेम करते हैं व अपना पथ-प्रदर्शक मानते हैं – ओम स्वामी; इस संदर्भ में वह मैं ही हूँ। वे गप्पबाजों को पलट कर जवाब देना चाहते थे। इसने मुझे बुद्ध के जीवन की एक कहानी स्मरण करवा दी।

ऐसा कहा जाता है की जब बुद्ध ने भिक्षुणियों को संघ में स्थान दिया (पाली भाषा में बौद्ध नन को भिक्षुणी कह कर संबोधित किया जाता है), तो उन्हें अत्याधिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, चूंकि उन्होंने परंपरा से हट कर कार्य किया व स्त्रियों को भी पुरुषों के समरूप स्थान प्रदान किया था। कुछ ने आपत्ति की व उन्हें इस पर पुनः विचार करने को कहा। उनका तर्क था कि बुद्ध के इतने सन्निकट स्त्रियों का उपस्थित रहना बुद्धिमत्ता नहीं। तथापि, संसार के तुच्छ विचारों से मुक्त, बुद्ध ने वह किया जो उनके विचार में उचित था। उनके संघ में स्त्री-श्रद्धालुओं की संख्या शीघ्रता से बढ़ती गयी और वे जहां कहीं भी यात्रा करते, बहुत सी भिक्षुणियाँ उनके साथ यात्रा करतीं। यह बात बहुत से लोगों के गले से नीचे नहीं उतरी व एक बेचैन मन के विचारों की भांति अफवाहें फैलने लगीं।

एक गाँव में उनके प्रवास के दौरान कुछ ऊधमी लोगों की एक छोटी सी टोली ने बुद्ध को अपशब्द कहने प्रारम्भ कर दिये, जिस कारण उन्हें अपना व्याख्यान बीच में ही समाप्त करने को बाधित होना पड़ा। परंपराएँ इत्यादि तोड़ने को लेकर वे सब लोग उन पर क्रोधित थे। उन सब ने बुद्ध को अपशब्द कहे, उन पर अधार्मिकता व अनुचित व्यवहार का आरोप लगाया। इस अपमान को संघ के कुछ सदस्य सह न पाये व उन उपद्रवियों का सामना करने के लिए उठ खड़े हुए।

“कृपया रुकें”, बुद्ध ने अपना हाथ उठा कर उन भिक्षुओं को रोक दिया। “वे ऐसा व्यवहार इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे मुझे जानते नहीं हैं।”
उन्होंने अपने आध्यात्मिक पुत्रों के क्रोध व दर्द से लाल हुए चेहरों को देखा। बुद्ध ने कुछ क्षण बीत जाने दिये और तब कहा, “किन्तु, आप तो मुझे जानते हैं। अतः अहिंसा के पथ पर चलें व बैठ जाएँ।”

हर व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में विचारों, भावनाओं, आकांशाओं (बहुधा अपूर्तित), दृष्टिकोण व कल्पनाओं आदि का अपना ही एक संसार विचरता रहता है। किसी के मुख से क्या निकलता है वह इसकी एक झलक मात्र है कि उनके मन में क्या है। अच्छे व प्रेम से भरे शब्द एक शांत एवं करुणा से भरे मन से उद्धत होते हैं; गप्प्शप्प व तीक्ष्ण शब्द एक बेचैन एवं ईर्ष्यालु मन से। यह कोई दिव्य-ज्ञान (रॉकेट साइन्स) नहीं है। इसके साथ साथ, जैसा कि मैंने कुछ वर्ष पूर्व लिखा था (यहाँ क्लिक करें), हर व्यक्ति को आपके प्रति एक दृष्टिकोण रखने का अधिकार होता है। उन्हें वैसा करने दें।

“स्वामी, क्या इसका यह तात्पर्य हुआ,” किसी ने मुझसे पूछा, “कि हम उनकी बड़बड़ सुनते रहें? क्या चुप रहना यह नहीं दर्शाता कि हम न केवल उनसे सहमत हैं, बल्कि उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं?”

यह एक युक्तियुक्त कथन है, किन्तु मैं यह परामर्श नहीं दे रहा कि आप केवल मौन अथवा क्रोध के मध्य ही चुनाव कर सकते हैं। जब आप एक गप्पें फैलाने वाले अथवा किसी आलोचक के समक्ष होते हैं, तब यदि आप भी क्रोधित होंगे तो आप किसी भी प्रकार से बेहतर कैसे हुए? क्या उस प्रकार का व्यवहार आप पर जँचता है? कुछ होगा भी तो यही कि वह आपके मन की शांति भंग कर देगा। जैसा कि मैं कहता हूँ, हर तरह की परिस्थिति में इस प्रकार का व्यवहार करें जो आप पर शोभा दे। ऐसा करने के लिए धैर्य, संकल्प बल, सावधानी व करुणा की आवश्यकता होती है, किन्तु यह पूर्णत: संभव है। किसी भी स्थिति में, मौन एवं विद्वेष से हट कर, एक तृतीय विकल्प भी है। एक उत्तम विकल्प – जिसे सुकरात द्वारा त्रय-स्तरीय फिल्टर परीक्षा कहते हैं।

“मुझे आपको कोई महत्वपूर्ण जानकारी देनी है,” एक जानने वाले व्यक्ति ने सुकरात से उस समय कहा जब वह बाजार से गुजर रहे थे। “यह आपके मित्र के विषय में है। वह….”
“ठहरें!” सुकरात ने प्रतिउत्तर में कहा। “जरा मुझे त्रय स्तरीय फिल्टर परीक्षा करके देखने दें कि क्या मैं यह जानना चाहता हूँ अथवा नहीं।”

वह व्यक्ति भौंचक्का रह गया जबकि सुकरात बोलते रहे, “पहला फिल्टर सत्य का है। आप जो कुछ भी मुझे बताना चाहते हैं, क्या आपने उसे स्वयं देखा है?”
“आ आ ….. मैंने यह किसी दूसरे से सुना,” वह व्यक्ति बोला, “किन्तु यह एक विश्वसनीय सूत्र द्वारा बताया गया है। मैंने ध्यान दिया कि….”
“हो सकता है, किन्तु यह मेरे प्रथम स्तर की परीक्षा में सफल नहीं हुआ,” सुकरात उसकी बात काटते हुए बोले, “चूंकि आप स्वयं भी नहीं जानते कि जानकारी सत्य है अथवा नहीं।”

वितीय फिल्टर उत्तमता का है। क्या आप मेरे मित्र के विषय में कोई अच्छी बात बताने वाले हैं?”
“ऐसा तो नहीं है, यही कारण है कि मैं चाहता था….”
“तो आप मुझे किसी के विषय में बुरी बात बताना चाहते हैं, किन्तु नहीं जानते कि वह सत्य है अथवा नहीं।”
“अंतिम फ़िल्टर उपयोगिता का है”, सुकरात बोले। “मेरे मित्र के विषय में आपकी जानकारी क्या मेरे लिए उपयोगी होगी?”
“संभवतः नहीं, मैं केवल आपके साथ साझा करना चाह रहा था….”

“अच्छा, यदि वह जानकारी संभवतः सत्य न हो, उत्तम न हो और किसी भी प्रकार से उपयोगी न हो”, सुकरात वार्तालाप समाप्त करते हुए बोले, “मैं वह जानना नहीं चाहता।” ऐसा कह कर ग्रीक विचारक आगे बढ़ गए।

आज के युग की ढेरों जानकारियों से जूझने का मेरा भी यही ढंग है। किसी वार्तालाप में भाग लेने से पूर्व मैं स्वयं से यह पूछता हूँ – क्या मैं यह जानना चाहता हूँ? क्या यह जानकारी मेरे मन-मस्तिष्क को अच्छे विचारों से भरेगी? क्या इससे कोई सार्थक अंतर पड़ेगा यदि मेरे पास यह जानकारी हो अथवा न हो? कुछ भो हो, भले कोई भी जो आपको जानता है अथवा नहीं जानता, वह आपके लिए अपनी एक राय अवश्य रखेगा। और यह पूर्णत: उचित है।

लोग वही देखते है जो वे देखने की इच्छा रखते हैं। और, यदि वे वह नहीं देख पाते जिसकी वे चाह रखते हैं तो वे उसे निर्मित कर लेते हैं। एक “गप्प” की यही परिभाषा होती है। एक अत्यधिक सक्रिय मन इसी प्रकार से कल्पनाएँ किया करता है।

सोश्ल मीडिया ने गप्प बाजी करने की हमारी प्रवृति को ईंधन देने का कार्य किया है। यह अनुपयोगी व अनावश्यक है। हम दूसरों के जीवन में ताक-झांक में बहुत सारा समय व्यर्थ गंवा देते हैं। एक छोटा सा निमो – जानकारियों के अथाह सागर में। कम से कम मुझे तो सोश्ल मीडिया पर सहयोगी नहीं होना चाहिए। जैसा कि कहा जाता है – हर अच्छा कार्य स्वयं से आरंभ करना चाहिए – अतः इस का पालन करते हुए मैंने निर्णय लिया है कि ओम स्वामी को फेस बुक अथवा किसी अन्य सोश्ल मीडिया के मंच पर नहीं होना चाहिए। अतः आज से फ़ेस बुक पर ओम स्वामी का पेज नहीं होगा। पिन प्रिक को समर्पित पेज भी हटा दिया गया है। मैं एक अति कुशल टीम के साथ मिलकर एक एप पर कार्य कर रहा हूँ जिसके द्वारा हम सब बिना फ़ेस बुक के भी सम्पूर्ण विश्व में एक साथ ध्यान सत्र में बैठ पाएंगे।

पाँच वर्ष तक मैंने हर सप्ताह एक लेख इस ब्लॉग के लिए पूर्ण निष्ठा से लिखा है। यह बहुत समय ले लेता था, परंतु मुझे आशा है कि इससे आप में से कुछ को सहायता मिली होगी। अब से मैं दो सप्ताह में एक लेख लिखा करूंगा। हर मास का प्रथम व तृतीय शनिवार। भारतीय समयानुसार प्रातः 6 बजे।

एक शिष्य ने पूछा, “गुरुदेव, क्या एक भिक्षु के लिए ई-मेल का उपयोग उचित है?”
“हाँ पुत्र,” गुरु बोले, “जब तक उसके साथ कुछ संलग्न न हो।”

सोश्ल मीडिया में संलग्नों की भरमार है – उलझे हुए व अव्यवस्थित; पूर्णत: अनावश्यक, शायद ही किसी लाभ के, व हर रूप में परिहार्य (टालने योग्य)। मैं एक भिक्षु हूँ, न कि रॉक स्टार। वे सब लोग जो वास्तव में मुझे अपने जीवन में चाहते हैं, मेरे साथ जुड़ने का मार्ग निकाल लेंगे। मुख्यत: तब, जब कि अनेकों अन्य व बेहतर ढंग उपलब्ध हैं। भविष्य में लिए जाने वाले कई अन्य कदमों की श्रंखला में यह मेरा पहला कदम है। जैसे जैसे समय करवट लेगा व धीरे धीरे मेरा अपने चारों ओर व्याप्त ऊर्जाओं के साथ मौन संवेग बढ़ेगा, हम एक दूसरे को और अच्छे ढंग से जान पाएंगे, आप मेरा मार्ग कुछ और स्पष्ट रूप से देख पाएंगे।

शांति।
स्वामी