ॐ स्वामी

योगी और दुनिया

अगले १२ महीनों के लिए आप का संकल्प क्या है? एक योगी के समान रहने की योजना है या दुनिया में तल्लीन होने की?

एक और वर्ष बीत गया और नया वर्ष आरंभ हो गया। यह तो मात्र कैलेंडर के अनुसार है। वास्तव में कुछ भी पूर्ण या आरंभ नहीं हुआ। यह केवल एक दृष्टिकोण है। परंतु सदियों से मानव जाति संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के लक्ष्य से खंडित और संगठित करता आया है। इस से मनुष्य को एक संरचना एवं प्रणाली मिली है। परंतु इस के फलस्वरूप मानव मन एक प्रकार से इस प्रणाली पर निर्भर हो गया है। उदाहरणार्थ आप स्वतः रात के आते ही विश्राम की अवस्था महसूस करने लगते…read more

भज गोविन्दम – २

भज गोविन्दम के छह भागों की शृंखला में यस द्वितीय भाग हैं। इसमें अगले छह छंदों का विवरण सुनिए।

यह द्वितीय व्याख्यान है – बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः। वृद्धस्तावत् चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥७॥ सारे बालक क्रीडा में व्यस्त हैं और नौजवान अपनी इन्द्रियों को संतुष्ट करने में समय बिता रहे हैं। बुज़ुर्ग केवल चिंता करने में व्यस्त हैं। किसी के पास भी उस परमात्मा को स्मरण करने का वक्त नहीं। का ते कांता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयं अतीव विचित्रः। कस्य त्वं कः कुत अयातः तत्त्वं चिन्तय यदिदं भ्रातः ॥८॥ कौन है हमारा सच्चा साथी? हमारा पुत्र कौन हैं? इस क्षण-भंगुर, नश्वर एवं विचित्र संसार में हमारा अपना…read more

भज गोविन्दम – १

शंकराचार्य द्वारा रचित भज गोविन्दम गहरा और शाश्वत ज्ञान से सुसज्जित है। इस प्रवचन में पहले छह छंदों का विवरण किया गया है।

भज गोविन्दम श्री शंकराचार्य की एक बहुत ही खूबसूरत रचना है। इस स्तोत्र को मोहमुदगर भी कहा गया है जिसका अर्थ है- वह शक्ति जो आपको सांसारिक बंधनों से मुक्त कर दे। छः व्याख्यानों के द्वारा मैंने इन पर रौशनी डालने का प्रयास किया है। सारे व्याख्यान हिंदी में हैं । अपने व्याख्यानों के दौरान मैं स्तोत्र का उल्लेख अवश्य करता हूँ ताकि आप इन्हें पूर्ण रूप से समझ सकें और इनका आनंद उठा सकें। भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते। सम्प्राप्ते सन्निहिते मरणे, नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे…read more

साधना के चार स्तंभ

आध्यात्मिक साधना में सफलता पाने के लिए क्या आपको एक गुरु या दीक्षा की आवश्यकता है? प्रस्तुत है साधना के चार प्राथमिक तत्व।

रामायण की एक कथा में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं कि राजा प्रतापभानु एक तपस्वी की तंत्र-मंत्र शक्तियों की निपुणता देख चकित हो जाते हैं। तब वह तपस्वी राजा को कहते हैं: जनी अचरजु करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं।। तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्ताता।। तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा।। (तुलसी रामायण, १.१६२.१-२) हैरान मत हो राजन। साधना से कुछ भी असंभव नहीं। तपस से ही ब्रह्मा सृजन करते हैं, विष्णु रक्षा करते हैं और शिव विनाश करते हैं।…read more

समाधि का अर्थ

वास्तव में समाधि क्या है? क्या यह शून्य की स्थिति है या अत्यन्त जागरूकता की स्थिति है या अत्यन्त चेतना की? आगे पढ़ें।

एक पाठक ने निम्नलिखित टिप्पणी की: हरि बोल प्रभु जी! मैं बड़ी उत्सुकता से आपके अगले लेख की प्रतीक्षा कर रहा हूँ और आशा करता हूँ कि आपकी कृपा से सत्य को समझने में सफल हूँगा। मेरा आप से एक प्रश्न है। प्रश्न समाधि के विषय पर है। समाधि या विशुद्ध परमानंद का क्या अर्थ है? मेरा यह समझना है कि समाधि एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति स्वयं की वास्तविकता जान लेता है, अर्थात उसे ईश्वर और स्वयं में कोई अंतर नहीं दिखाई देता। व्यक्ति को यह अहसास होता है कि वह…read more

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