ॐ स्वामी

पीड़ा अनिवार्य है, दुःखी होना ऐच्छिक

दर्द अपरिहार्य है, परंतु दुख एक चुनाव है। यह सब मन की स्थिति पर निर्भर करता है।

एक प्रसिद्ध कहावत है जो माना जाता है कि गौतम बुद्ध के वचन थे – “पीड़ा अनिवार्य है किंतु दुःखी होना ऐच्छिक”। कितनी गहरी बात है! यदि आप पीड़ा को छोड़ दें, उसे जाने दें, उस से चिंतित ना हों तो आप को कोई दु:ख ही नहीं होगा। दु:ख के अभाव में पीड़ा महत्वहीन हो जाती है। मुझे एक कहानी याद आ गई जो मैंने कुछ समय पहले सुनी थी। सूर्यास्त का समय था। दिन के उपदेश और भिक्षा के उपरांत दो युवा संन्यासी मठ को लौट रहे थे। दोनों…read more

एकांत: अकेले रहने की साधना

एकांत की साधना अपने आप को बेहतर समझने में मदद कर सकती है। अपने मन को शांत करने की यह अत्यंत शक्तिशाली साधना है।

अकेले रहने को संस्कृत में एकांत कहते हैं। जो व्यक्ति मन को अपने अंदर की ओर केंद्रित करने में सक्षम हो उस की प्रमाणिक पहचान यह होती है कि उसे एकांत अत्यंत सुखदायी लगता है। एकांत रहने की असमर्थता बेचैन मन का अचूक लक्षण है। एक शांत मन के लिए एकांत जैसा अथाह कुछ नहीं तथा एक बेचैन मन के लिए एकांत से अधिक भयानक कुछ नहीं। केवल दो प्रकार के व्यक्ति ही एकांत में सुखद रह सकते हैं – आलसी और योगी। एकांत से मेरा अर्थ यह नहीं कि…read more

क्या ईश्वर क्रोधित होते हैं?

क्या यह संभव है कि ईश्वर आप पर क्रोधित हो कर आपके पापों व बुरे कर्मों के लिए आपको सज़ा देते हैं? यदि हाँ, तो क्या वो वास्तव में ईश्वर हैं?

दो ऐसे प्रश्न हैं जो मुझसे अनेकों बार पूछे गये हैं। अभी कुछ दिन पहले एक सज्जन जिन्हें मैं एक अंतराल से जानता हूँ, उनके द्वारा ये प्रश्न पूछे गये। मैंने उत्तर भेज दिया। तत्पश्चात्, मैंने सोचा कि यह उत्तर मुझे अन्य व्यक्तियों के साथ भी साझा करने चाहियें। भविष्य में इस लेख का सन्दर्भ दे कर मैं समय की बचत कर सकता हूँ। उन प्रश्नों का मैं यहाँ भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ – १. मैं एक विशेष देव की पूजा करता हूँ। यदि मैं किसी अन्य रूप की…read more

मौन – निस्तब्धता की साधना

जब आप मौन की साधना करते हैं तो आत्मा की आवाज़ एक कली की तरह खिल जाती है। तब आप सुंदर खुशबू फैलाते हैं।

यह आत्म परिवर्तन योग शृंखला में पाँचवा अनुच्छेद है। निस्तब्धता की साधना मानसिक परिवर्तन इस पोस्ट में आत्म परिवर्तन का एक मुख्य अभ्यास प्रस्तुत है। आत्म परिवर्तन की राह पर पहला अभ्यास मौन रहने की कला है। यह आवश्यक नहीं कि इसी अभ्यास से आप आत्म परिवर्तन प्रारंभ करें, इस विषय का केवल मैं सब से पहले विस्तृत वर्णन कर रहा हूँ। निस्तब्धता मन की शांति की प्राप्ति में आप की सहायता कर सकता है। निस्तब्धता को संस्कृत में मौन कहते हैं। दिलचस्प बात यह है कि भगवद गीता में…read more

भज गोविन्दम – ६

शंकराचार्य हमें आत्मसमर्पण, ध्यान तथा मानव जीवन का वास्तविक लक्ष्य अर्थात मोक्ष की दिशा में काम करने का आग्रह कर रहे हैं।

यह छठा और अंतिम व्याख्यान है – गेयं गीता नाम सहस्रं ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्। नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥२७॥ उस परम परमेश्वर का सदैव ध्यान कीजिए। उसकी महिमा का गुणगान कीजिए। हमेशा संतों की संगती में रहिए और गरीब एवं बेसहारे व्यक्तियों की सहायता कीजिए। सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः। यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥२८॥ जिस शरीर का हम इतना ख्याल रखते हैं और उसके द्वारा तरह तरह की भौतिक एवं शारीरिक सुख पाने की चेष्टा करते हैं, वह शरीर एक…read more

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