ॐ स्वामी

आप प्रसन्न हैं अथवा अप्रसन्न हैं?

प्रसन्नता मन की एक अवस्था है। जितना अधिक आप अपने आप से सुखी एवं सहमत हैं, आप उतने अधिक प्रसन्न रहेंगे।

मानव जीवन एक लोलक के समान होता है। यह सकारात्मक-नकारात्मक, अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित, सही-गलत, उतार-चढ़ाव आदि अन्य द्वंद्वों के बीच दोलन करता रहता है। परंतु यह सब ही व्यक्तिपरक हैं। यदि आप उन्हें अनुमति ना दें वे आप को प्रभावित नहीं कर सकते हैं। इस विषय पर मैं आप को एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ – एक समय की बात है एक भिक्षु हुआ करता था। उसने कईं वर्षों के लिए ध्यान, चिंतन और तपस किया परंतु फिर भी आत्मज्ञान प्राप्त करने में सफल ना हुआ। वह अपने चारों ओर…read more

विचार – ध्यान प्रक्रिया में तीसरा व्यवधान

अवांछित विचारों की ऊंची लहरें शांत मन रूपी नाव को हिला डुला कर आपके ध्यान में रुकावट डाल सकती हैं।

उचित रीति से ध्यान करने की प्रक्रिया में चार प्रमुख व्यवधान हैं। ध्यान में सुस्पष्ट परिणाम पाने के लिए इनके प्रति सावधानी परम आवश्यक है। विगत लेखों में मैंने बेचैनी व आलस्य – इन दो व्यवधानों की विस्तार से विवेचना की। आज मैं तीसरे व्यवधान पर प्रकाश डालने जा रहा हूँ, वह है – अवांछित विचार। ध्यान द्वारा आप मात्र एक विचार पर अपने को एकाग्र करने की क्षमता विकसित करते हैं; स्वयं द्वारा चयनित एक विचार पर एकाग्रता; कालांतर में उस एक विचार के साथ सम्पूर्ण तादात्मय स्थापित कर,…read more

अनुशासन की कला

दृढ़ता और अनुशासन के द्वारा असंभव भी संभव हो जाता है। मानव जाति की प्रगति का यही कारण है।

यदि इस विश्व में जन्मे सबसे प्रसिद्ध एवं सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियों को देखा जाए – सबसे प्रभावशाली नेता, महान विचारक, सर्वोत्तम दार्शनिक तथा अन्वेषक, तो संभवतः आप उन सब के जीवन में एक मूलतत्त्व पाएंगे – अनुशासन। उन सब ने अत्यधिक अनुशासन का जीवन जिया। अनुशासन वह कला है जिस के द्वारा आप अपने निर्धारित पथ पर चलते हैं, अपने बनाए गए योजनाओं का पालन करते हैं तथा अपने मन को नियंत्रण में रखते हैं। यह एक कौशल है। बहुधा लोग मुझसे कहते हैं कि वे कुछ करना चाहते हैं –…read more

मृत्यु का सत्य

मृत्यु केवल इस जीवन का अंत ही नहीं एक नये जीवन का प्रारंभ भी है।

यहाँ हिन्दी में एक वीडियो प्रवचन है। प्रस्तुत है इसका एक संक्षिप्त अनुवाद – आज मेरे प्रवचन का विषय है मृत्यु, एक चरण जिससे हर किसी को गुजरना होगा। वह मृत्यु जो शरीर के अंत से शुरू होता है – आत्मा का नहीं, केवल शरीर का अंत। पहले मैं एक छोटी सी कहानी बताना चाहता हूँ। एक व्यक्ति ज्ञान और प्रज्ञा की खोज में एक साधु के पास जाता है। वह संत से पूछता है कि वे इतने संतुष्ट और शांत कैसे रह पाते हैं? कया वे कभी दुनिया के…read more

ध्यान में सुस्ती

यान में गजराज को सुस्ती का द्योतक माना जाता है। एक कुशल साधक स्वीकृति व सतर्कता द्वारा इसे वश में करता है।

विगत लेख में मैंने ध्यान के समय होने वाली बेचैनी के विषय पर चर्चा की, जो उचित ध्यान प्रक्रिया में सर्वप्रथम व्यवधान है। जैसे कि पहले भी चर्चा हो चुकी है कि मुख्य रूप से चार ऐसी त्रुटियाँ हैं जो साधक के सिद्ध बनने के मार्ग में रुकावट हैं; जो साधक को अपने परम चेतन, परम सत्य स्वरूप के अनुभव से रोके रखती हैं। तथापि, यदि साधक अपने मार्ग पर सुदृढ़ रहता है व इन व्यवधानों के निराकरण में निरंतर कार्यरत रहता है, तब, ऐसा साधक उस दिव्यता, उस परमानंद…read more

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