ॐ स्वामी

कृतज्ञ रहें

जीवन के विभिन्न रंगों के आभारी रहें; यही जीवन को जीने लायक बनाते हैं। शिकायत करना बंद करें।

मेरे सन्यास लेने के कुछ वर्ष पूर्व, एक समय उत्तर भारत में अत्यंत ठंड पड़ी। ठंड के कारण कईं बेघर व्यक्तियों की मृत्यु हुई। मेरे पिता से प्रेरित हो कर मैं ने समाज के लिए कुछ करने का निर्णय लिया। मेरी कंपनी के एक वरिष्ठ प्रबंधक, जो मेरे एक अच्छे मित्र थे, उन्होंने और मैं ने निर्धन एवं बेघर व्यक्तियों को कंबल वितरित करने का निर्णय लिया। परंतु हम किसी अपरिचित संगठन को कंबल नहीं देना चाहते थे। जिन व्यक्तियों को वास्तविक रूप से आवश्यकता थी हम उनके हाथों में…read more

भावनात्मक रूपान्तरण

जिस प्रकार बहते हुए जल द्वारा तलछटी निर्मित हो जाती है, उसी प्रकार अपरित्यक्त विचार मानसिक छाप बन जाते हैं; वे भावनाओं को जन्म देते हैं।

गत कुछ महीनों में हमने आत्म-परिवर्तन के मार्ग पर, मानसिक परिष्कार के मुख्य सूत्रों की विवेचना की। अब मैं आपके लिए भावनात्मक रूपान्तरण का उल्लेख करूंगा। आने वाले आठ से दस सप्ताह में मेरा इस श्रंखला को सम्पूर्ण करने का लक्ष्य रहेगा। यद्यपि मैं अपनी व्याख्या का प्रारम्भ आज से कर रहा हूँ, तथापि, भावनाओं के विषय पर मैं पहले भी बहुत कुछ लिख चुका हूँ। मुख्यतः सकारात्मक व नकारात्मक भावनाओं पर, सकारात्मक रहने पर, प्रेम पर, एवं नकारात्मक भावनाओं पर विजय पाने को ले कर। यदि आपने वह लेख…read more

प्रतिबिंब – ध्यान में चतुर्थ व्यवधान

जब आप ध्यान में बैठते हैं, व केन्द्रित होने का प्रयास करते हैं, आपके अन्तःकरण में अव्यवस्थित प्रतिबिंबों की बौछार होने लगती है। यह एक व्यवधान है।

लगभग बीस सप्ताह पूर्व, हमने आत्म-रूपान्तरण के मार्ग पर अपनी यात्रा प्रारंभ की। मैंने उल्लेख किया कि आत्म-रूपान्तरण की यात्रा में चार विभिन्न स्तरों पर स्वयं को रूपांतरित करने की प्रक्रिया सम्मिलित होती है, वे हैं – मानसिक, भावनात्मक, नैतिक एवं शारीरिक। सम्पूर्ण शुद्धिकरण, उपरोक्त चारों स्तरों को समझना व पूर्णत: परिवर्तित करना , इनके बिना दिव्यता की उत्कृष्त्तम स्थिति प्राप्त करना असंभव है। मैंने अपने लेख मानसिक परिष्कार से आरंभ किए। हमने आपकी एकाग्रता, संकल्प शक्ति व ज्ञान को सशक्त करने की विभिन्न प्रक्रियाओं की विवेचना की। ध्यान में…read more

आठ सांसारिक भावनाएँ

कमल सदा कीचड़ में उत्पन्न होता है, खिलता है व वहीं रहता है, तथापि वह सदा निर्मल रहता है – हर तरह की गंदगी व दलदल से ऊपर।

एक समय की बात है, एक गाँव में एक विशिष्ट व्यापारी रहता था। वह धनी, प्रख्यात, आदरणीय व समाज में विशेष स्थान रखता था। तथापि, वह बेचैन व चिंतित रहता था। वह अपनी असफलता, अपना सब कुछ गँवा बैठने, व इस तरह के अकथित भयपूर्ण विचारों से छुटकारा पाने में असमर्थ था। वह अपने आध्यात्मिक गुरु के समक्ष जा कर विनती करता है, “आपकी कृपा से मैं हर प्रकार से सम्पन्न हूँ, तथापि मैं सदा भयभीत व चिंतित रहता हूँ। कृपया मुझे ऐसा ज्ञान दें कि, भले ही कुछ भी…read more

प्रेम की भाषा बोलना

कोई भी इतना सशक्त नहीं कि प्रेम की भाषा का विरोध कर पाये। यह हृदय को भेदते हुए सीधे आत्मा में उतर जाती है।

रोचक बात यह है कि सभी मानवीय सम्बन्धों में, विषेश रूप से सामाजिक एवं व्यक्तिगत, सौहार्द व सद्भाव स्थापित करना मात्र एक साधारण घटक पर निर्भर है। यह भौतिक उपहारों से संबंधित नहीं है, न ही यह आवश्यकताओं की पूर्ति को ले कर है। आप इसके द्वारा किसी का जीवन बिगाड़ भी सकते हैं; अथवा तो उस व्यक्ति के सर्वश्रेष्ठ गुणों को उजागर कर सकते हैं; आप उन्हें प्रोत्साहित कर सकते हैं अथवा तो उनके आत्म-सम्मान को पूरी तरह तहस नहस कर सकते हैं। आपको किस तरह देखा-समझा जाता है,…read more