ॐ स्वामी

अपवित्र विचारों से कैसे मुक्ति पाएं

मन बंदर की भांति होता है, सदैव एक स्थान से दूसरे स्थान पर छलांग लगाता है। वह पवित्र-अपवित्र अथवा अच्छा-बुरा नहीं होता। मन तो केवल मन होता है।

“क्या अशुद्ध विचारों का आना कोई पाप है? मैं कैसे इन विचारों से मुक्त हो सकता हूँ ?”। किसी ने मुझसे यह प्रश्न किया था। इससे पहले कि मैं इस प्रश्न का उत्तर दूं मैं आप को सूचित करता हूँ कि मुझे पाप की धारणा में कोई विश्वास नहीं है। पाप अपने आप में कुछ नहीं है। मैं ऐसा नहीं कहता कि जो कुछ भी हम करें एवं सोचें वह सही होता है। परंतु सामान्यतय पाप का तात्पर्य यह होता है कि आप ने कुछ ऐसा किया है जिससे ईश्वर…read more

स्वप्नों की पूर्ति कैसे की जाए

यों कुछ लोगों को दूसरों की तुलना में और शीघ्र सफलता प्राप्त होती है? यह इसलिए क्योंकि उन्हें अपने सपनों पर पूर्ण विश्वास होता है।

एक समय की बात है एक यात्री बहुत उदास और परेशान सा अपनी दुनिया में खोया हुआ एक घने वन से जा रहा था। उसे लग रहा था कि उसका समग्र जीवन संघर्षमय रहा था। उसके सभी मित्र, सहकर्मचारी एवं भाई-बहन प्रगति कर चुके थे, किंतु वह जहाँ था वहीं का वहीं रह गया था। उस को मन ही मन लगने लगा था कि अन्य सब ही लोग बड़े ही भाग्यशाली थे परंतु उस के भाग्य में केवल कड़ा श्रम ही लिखा था। वास्तव में वह एक जादुई वन से…read more