आलोचना का सामना करने के तीन सिद्धांत

जिस दिन आप क्रोध किए बिना आलोचना का सामना करना सीख जाएंगे, आप अपने आप को शांति के अनंत सागर किनारे परमानंद में स्थित पाएंगे।

हमारा मन आलोचना को अतिक्रमण के रूप में देखता है। यही सत्य है। विशेषकर जब दूसरी ओर से नकारात्मक प्रतिक्रिया अवांछित हो। प्रायः किसी भी रिश्ते में शत्रुता का बीज तब अंकुरित होता है जब आलोचना, जो अनिवार्य है, या तो व्यक्त की जाती है या निर्दयता से परिष्कृत की जाती है। तत्पश्चात दूसरे व्यक्ति के सार्थक व उपयोगी शब्दों को भी पक्षपातपूर्ण राय के रूप में अस्वीकार कर दिया जाता है। “आलोचना भले ही अनुकूल ना हो, परंतु यह आवश्यक है। यह मानव शरीर में कष्ट के रूप में…read more