ॐ स्वामी

प्रेम करना और बदले में प्रेम पाना

एक स्नेहमय हृदय के लिये प्रेम सबसे अप्रत्याशित द्वार पर सबसे अनपेक्षित समय पर आकर दस्तक देता है।

मैंने एक उद्धरण पढ़ा था, जिसमें कहा गया था कि “मुझसे प्रेम करो तो मैं तुम्हारे लिये पहाड़ भी उठा लूँगा और यदि तुमने मुझे चोट पहुँचाई तो मैं उसी पहाड़ को तुम्हारे सर पर पटक दूँगा।” मुझे लगता है कि यह हमारे जीवन के दो पहलुओं का मूल निष्कर्ष है। प्रथम यह कि किस प्रकार प्रेम की उपस्थिति या अनुपस्थिति हमें दूसरों के प्रति या स्वयं के प्रति कुछ भी महसूस करने को बाध्य करती है। दूसरा यह कि हम कैसे आत्मसंतुष्टि को ही प्रेम मानकर बैठ जाते है।…read more

वास्तव में कितना पर्याप्त है

महान सिकंदर के जीवन का यह प्रसंग भौतिक लक्ष्यों के पीछे दौड़ने की व्यर्थता को प्रदर्शित करता है।

कहा जाता है कि ग्रीस का एलेक्ज़ेंडर तृतीय, जिसे महान सिकंदर के नाम से भी जाना जाता है, ने महान योगी दंडिनी के पास अपना दूत भेज कर उन्हें प्रवचन के लिए आमंत्रित किया। अनगिनत व्यक्तियों की बलि चढ़ा कर सिकंदर ने संसार पर विजय प्राप्त की थी। उसकी सीमाएं दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही थीं। उसने इस योगी के विषय में बहुत कुछ सुना था। उधर दंडिनी ने वन में बनी अपनी कुटिया में रहने को ही प्राथमिकता दी और सिकंदर के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। सिकंदर को…read more

जीवन की पहेली

कभी कभी आप को केवल जीवन के अन्य किसी पहलू पर ध्यान केंद्रित करना होता है। फिर जीवन की पहेली एक सुंदर चित्र के समान प्रतीत होती है।

एक दिन ध्यान-साधना शिविर में एक महिला मेरे पास आईं। उन्होंने कहा – जीवन जीने के लिए जो कुछ भी उन्हें चाहिए था, वह सब उन्हें मिला। फिर भी वह प्रसन्न नहीं हैं। वह वर्षों से अकेलेपन की भावना से जूझ रही हैं। उन्होंने ध्यान आदि भी किया परंतु अनुकूल परिणाम नहीं पाया। “मेरे भीतर निरंतर एक रिक्तता है और मैं जीवन का आनंद लेने में पूर्णतः असमर्थ हूँ। मेरे परिवार में सभी बहुत अच्छे हैं और मुझे कोई आर्थिक कष्ट भी नहीं। किंतु मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि…read more

प्रसन्नता का गुब्बारा

आज के युग में कैसे प्रसन्न रहा जाए? जानने के लिए यह लेख पढ़ें - दार्शनिक किंतु सत्य से परे नहीं।

एक समय एक आश्रम में एक गुरू के सैकड़ों शिष्य एकत्रित हुए। वे वहाँ अपने गुरू की एक झलक पाने, उनके ज्ञानपूर्ण वचन को सुनने और ध्यान आदि सीखने के लिए एकत्रित हुए थे। विशेषत: वे सभी यह जानना चाहते थे कि इस तनावपूर्ण संसार में प्रसन्न कैसे रहा जाए। क्या ऐसा कोई मार्ग है भी? गुरू ने उनके प्रश्नों को धैर्यपूर्वक सुना और फिर ‘प्रसन्नता’ पर अपना व्याख्यान आरंभ किया। अपने प्रवचन के बीच में वे रुके और अपने पाँच सौ अनुयाइयों में प्रत्येक को एक गुब्बारा दिया। उन्होंने…read more

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