ॐ स्वामी

A Fistful of Love – मुठ्ठी भर प्रेम

“मुठ्ठी भर प्रेम” (अ फिस्टफुल ऑफ् लॅव् - A Fistful of Love) - यह मेरी नई पुस्तक का नाम है जिसमें प्रेम, आपसी संबंध व जीवन के विषय पर मेरे ब्लॉग में से चुने हुए पचास लेख संकलित हैं।

एक बार बुद्ध अपने नौ भिक्षु-शिष्यों सहित नदी के किनारे चले जा रहे थे। अपने शांत व शालीन स्वाभावनुसार वे आनंद के साथ ‘सतर्कतापूर्ण व्यवहार’ विषय पर वार्तालाप कर रहे थे कि अचानक लगभग सभी भिक्षु रुक गये व नदी के दूसरे तट की ओर अतिविस्मयपूर्वक देखने लगे। वहाँ से एक योगी नदी पार कर इस तट की ओर बढ़ रहा था। साधारण परिस्थिति में इसमें ध्यानाकर्षण का कोई प्रयोजन नहीं था। मुख्य रूप से उस समय जब बुद्ध स्वयं सतर्कता पर व्याख्यान दे रहे हों। किंतु यह योगी नाव…read more

एक सिद्धांत

मार्गदर्शक सिद्धांत एक प्रकाश की भांति है। हमारे चारों ओर फैले अंधकार को दूर कर यह बेहतर विकल्प चुनने में हमारी सहायता करता है।

बहुधा हम कुछ विशेष करने का संकल्प लेते हैं और योजना बनाते हैं। कुछ विशेष विधि से कार्य करने की योजना। किंतु प्रलोभन की एक लहर, एक छोटी सी बहस, एक छोटा द्वन्द्व और सब कुछ किनारे पर आ जाता है। हम अपनी प्रतिज्ञा भूल जाते हैं और फिर जहाँ के तहाँ आ जाते हैं। फिर हम चिंता में सोचते रहते हैं तथा स्वयं को कोसते रहते हैं। हमें बुरा लगता है और हम स्वयं को दोषी करार दे देते हैं। हम पुनः संकल्प लेते हैं। इस बार कुछ कम…read more

खाली नाव

जब दूसरा व्यक्ति हमारे क्रोध को उकसाने के लिये उत्तरदायी है, तो क्या किया जाए? और क्या वह ही वास्तव में उत्तरदायी है?

क्या किया जाए जब दूसरा व्यक्ति आपको क्रोधित करता है जब कि आप की कोई गलती ही नहीं है? वास्तव में यह सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न है। मैं चांग जू की शिक्षा पर आधारित एक प्रसिद्ध लघुकथा से प्रारंभ करता हूँ। जिस प्रकार कुछ व्यक्ति अपनी कार या अन्य उपकरणों को लेकर उन्मत्त होते हैं, उसी प्रकार एक व्यक्ति था, जो अपनी नाव को पागलों की भांति प्यार करता था। हर रविवार वह उसे साफ करता, झील में लेकर जाता, वापस लाता और फिर साफ करता। वह अपनी…read more

विश्वास पर एक कहानी

प्रस्तुत है विश्वास और समर्पण पर एक सुन्दर कहानी जो महाकाव्य महाभारत से ली गई है।

आज मैं महाकाव्य महाभारत से ली गई एक छोटी सी कहानी से यह लेख आरंभ करता हूँ। एक कहानी, जो विश्वास व समर्पण, नियति एवं ईश्वरत्व पर है। यह घटना तब की है जब समस्त देश के असंख्य सैन्य-दलों को भारत के सर्वाधिक रक्तरंजित महायुद्ध के लिये संघटित किया जा रहा था। कौरवों व पांडवों के बीच होने वाले महायुद्ध महाभारत के लिये, जो कि अठारह दिनों तक चलने वाला था। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र को विशाल अश्वरोही सेनाओं के आवागमन के योग्य बनाने हेतु सज किया जा रहा था। प्रतिस्पर्धी…read more

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