ॐ स्वामी

मौन के चार प्रतिरूप

दिव्य-परमानंद एवं शांति एक विश्रांत मन में उसी प्रकार उदित होते हैं जिस प्रकार एक स्वच्छ सरोवर में सुंदर कमल।

एक बार मैंने एक उक्ति पढ़ी थी कि, “मौन स्वर्ण के समान है… यदि आपके घर में छोटा शिशु नहीं। उस स्थिति में, मौन बहुत संदेहास्पद है।” उदाहरणस्वरूप, क्या आपने कभी गहन रात्रि में व्याप्त मौन में विश्रांति की अनुभूति की है? प्रमुख रूप से एक ऐसे स्थान में जो प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर हो। वहाँ की वायु में एक अवर्णननीय ताजगी विद्यमान होती है। आप अपनी देह को स्पर्श कर हिलौरे लेती उस सुखकर, सुहावनी समीर की अनुभूति कर पाते हैं। आप उस भव्य, विशाल, तारों से जगमगाते अंबर…read more

स्वतन्त्रता का मूल्य

वास्तविक स्वतन्त्रता, उतावलेपन से दायित्व की दिशा में प्रगति है। इसका अर्थ है – अपने कृत्यों के परिणाम के प्रति सजग रहना।

भीतर गहराई से हम स्वतंत्र प्राणी हैं। लगभग। जन्म के समय हमारी स्वतन्त्रता का बोध कराने के लिए, हमें बंधन मुक्त करने को नाभि की नाड़ भी काट दी जाती है, , इसी तथ्य को दर्शाते हुए कि हमारा मूल संबंध स्वयं से होता है, न कि अन्यों से। कहीं न कहीं, उस प्रेम की खोज के दौरान भी जो कि हमारा सहारा बन सके, वास्तव में हम स्वतन्त्रता ही ढूंढ रहे होते हैं। किसी संबंध में हम जितनी अधिक स्वतन्त्रता अनुभव कर पाते हैं, उतना अधिक हम पूर्णता की…read more

एक जीवन अनेक जीवन

जिस प्रकार नन्ही नन्ही बूंदें श्रेणीबद्ध हो कर एक जलप्रपात बन जाती हैं, उसी प्रकार छोटे छोटे पल व अनुभव मिलकर वह रूप लेते हैं जिसे जीवन कहते हैं।

क्या आपको कभी ऐसी अनुभूति हुई कि आपने अपने जीवन में कोई सार्थक कार्य नहीं किया? अथवा तो यह कि आप अपने स्वप्नों के अनुरूप जीवन नहीं जी पाये? यदि हाँ, तो आप अकेले नहीं हैं। प्रायः, जीवन को हम एक अविभक्त इकाई के रूप में ही देखते हैं। हमें लगता है चूंकि अब हम युवावस्था से बहुत आगे आ चुके हैं, अतः अब सब कुछ खो चुका है। कि, अब अधिक कुछ नहीं किया जा सकता। आज, मैं आपके समक्ष एक भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहता हूँ। कुछ ऐसा…read more

84 वीं समस्या

प्रस्तुत है एक सुंदर दृष्टांत, जो दर्शा रहा है की बिना एक भी समस्या के जीवन की कितनी संभावना बनती है।

एक बार एक सम्पन्न किसान, अति आशान्वित हो, बुद्ध के पास पहुंचा। उसने महात्मा के सम्मुख साष्टांग प्रणाम किया व उनके आशीर्वाद की आकांशा की। बुद्ध ने हाथ उठा कर उसे आशीर्वाद दिया। “हे परम पूजनीय!”, किसान बोला, “मैं एक घोर विपदा में फंसा हूँ और मैं जानता हूँ कि केवल आप ही मेरी सहायता कर सकते हैं।” बुद्ध शांत रहे और वह व्यक्ति बताने लगा कि उसका आवारा पुत्र उसे परेशान कर रहा है और, यह भी कि उसे अपनी पत्नी पर अत्यंत क्रोध आ रहा है क्योंकि वह…read more

एक हज़ार दर्पणों वाला कक्ष

प्रस्तुत है एक सुन्दर कथा, जिसमें दृष्टान्त दिया गया है कि किस प्रकार हम अपना संसार रचते हैं एवं विशिष्ट प्रकार के व्यक्तियों को आकृष्ट करते हैं।

चीन के एक विशेष शाओलिन देवगृह में एक अनूठा कक्ष है। उसकी दीवारों व छतों में एक हज़ार दर्पण जड़े हुए हैं। बहुत से भिक्षुक यहाँ प्रशिक्षण लेते हैं और स्वयं को हज़ारों कोनों से दर्पण में निहारकर अपनी गति-विधि में असाधारण परिशुद्धता प्राप्त करते हैं। एक समय चोरी छिपे वहाँ एक कुत्ता आ गया। स्वयं को एक हज़ार कुत्तों से घिरा देखकर वह असुरक्षित, आतंकित हो गया। उसने अपने दांत दिखाए, गुर्राया और दूसरे कुत्तों को भगाने के लिये भौंका। निस्संदेह एक हज़ार कुत्ते उस पर गुर्राए और भौंके।…read more

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