ॐ स्वामी

मित्रता का सारांश

मित्र एक गुलदस्ते में सजे विभिन्न फूलों के समान होते हैं, हर एक का अपना ही सौंदर्य, अपनी ही सुगंध व रंग होता है।

जीवन की सर्वोत्तम उपलब्धियों में से एक है कुछ ऐसे मित्रों का होना जिन पर आप निर्भर हो सकें व कुछ भी साझा कर सकें। समय के साथ अधिकांशतः मित्रता का हर बंधन ढीला पड़ जाता है, किन्तु कुछ लोग जीवनपर्यन्त उसे बनाए रखते हैं। एक विश्वसनीय मित्र का होना एक निष्ठावान जीवन साथी, जिसे आप प्रेम [ वास्तव में ] करते हों, के बाद दूसरा सबसे सुंदर उपहार होता है। मैं ऐसे बहुत से युवाओं से मिलता हूँ जिनका जीवन पूर्ण रूप से उनके मित्रों के आसपास ही घूमता…read more

ईश-कृपा की एक गाथा

ईश्वरीय-कृपा प्रतिकूलताओं से आपके कोमल हृदय का संरक्षण वैसे ही करती है जैसे एक सीप अपने अंदर बसे प्राणी का। प्रकृति के पास युक्ति विद्यमान है।

एक दिन मैंने स्वामी राघवनंद या रघु स्वामी, जैसा की मैं उन्हें बुलाता हूँ ( अति समर्पित साधकों में से एक, एवं जीवन-ऊर्जा व अनासक्त भाव से परिपूर्ण ) से पूछा कि क्या मैं अपने ब्लॉग पर उनके जीवन का एक प्रसंग साझा कर सकता हूँ; श्रद्धा और अनुग्रह, सरलता और नैतिकता की एक अनुपम गाथा। एक उदार हृदय से, व्यापक मुस्कान बिखेरते हुए, उन्होंने सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी। यदि आपने मेरी जीवनी पढ़ी है तो आप रघु स्वामी को जानते ही हैं। वे पूर्व-आश्रम के प्रदीप ब्रह्मचारी हैं,…read more

प्रेम पर दो शब्द

प्रेम से तात्पर्य है की सामने वाले व्यक्ति को आपके सानिध्य में पूर्ण सहजता का आभास हो; ताकि वह अपने मूल स्वभाव को अभिव्यक्त कर सके।

बहुधा मैं ऐसे लोगों से भेंट करता हूँ जो मुझे बताते हैं कि उनके व उनके साथी के मध्य अच्छा सामंजस्य नहीं है। “हमारे विचार भिन्न हैं, हमारी आदतें, हमारे लक्ष्य भिन्न हैं। हमारे बीच अनुरूपता नहीं है”, वे कहते हैं। अधिकांशतः, पुरुष जहां अधिक स्वतन्त्रता ढूँढता है व निजी समय चाहता है, वहीं स्त्री अधिक सुरक्षा व उत्कृष्ट समय बिताने की अपेक्षा रखती है (कभी कभी, हालांकि बहुत कम, इसका उल्टा भी सत्य होता है)। जब दो व्यक्ति सामंजस्य बना कर नहीं रहते, तब इसका यह तात्पर्य नहीं कि…read more

पीड़ा का दिशाक्रम

दुख की अपनी ही एक तय अवधि होती है। जिस प्रकार सरिता अपना मार्ग स्वयं निर्मित करती चलती है, दुख को भी बहने देना चाहिए इससे पूर्व कि वह जीवन रूपी सागर में समा पाये।

ऐसा कहा जाता है कि आत्म-साक्षात्कार के उपरांत जब बुद्ध अपने परिवार से भेंट करने पहुंचे, तब उनका स्वागत पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ किया गया। उनके पिता ने, जो वहाँ के राजा थे, बुद्ध का सत्कार एक राजकुमार की भांति किया जो कभी उनके पुत्र हुआ करते थे। मंत्रीगण व राज परिवार के सभी सदस्यों ने अति आदर सहित उनका पूर्ण भाव पूर्वक अभिनंदन किया। उनका अपना पुत्र, राहुल, भाग कर उनके समीप आया और उनके भुजापाश में बंध गया। सम्पूर्ण सात वर्ष तक उसने अपने पिता के विषय…read more

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