ॐ स्वामी

आत्म-मोह

क्या आप जानते हैं कि एक आत्म-मोहित व्यक्ति और एक गर्म हवा के गुब्बारे में क्या समानता है? प्रस्तुत हैं मेरे विचार…

कुछ सप्ताह पूर्व किसी ने मुझे यह ई-मेल लिखा मै आपसे पूछना चाहता हूँ कि एक आत्म-मोही साथी के साथ कैसे रहा जाए? उनसे आध्यात्मिक दृष्टि से कैसे व्यवहार किया जाए? आत्म-मोहित व्यक्ति ऐसे क्यों होते हैं? और आत्म-मोहित व्यक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है? मेरे विचार से इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए एक दार्शनिक से अधिक एक मनोवैज्ञानिक श्रेष्ठतर रूप से प्रशिक्षित है। फिर भी मैं से इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करता हूँ। मैंने एक समय एक उक्ति पढ़ी थी “मेरे विषय में मेरे विचार…read more

आनंद की पुकार

यदि हम सुखों को ही आनंद समझ बैठें तो यह एक प्राप्ति हो जाती है। जबकि आनंद तो एक यात्रा, एक राह, एक अवस्था है।

हमारे जीवन के कुछ पहलुओं को हम परिवर्तित कर सकते हैं। कुछ पहलुओं को हम नियंत्रित या प्रभावित कर सकते हैं। किंतु बहुत से पक्षों से हमें सामंजस्य बैठाना पड़ता है। यही सबसे बड़ी चुनौती है। यह सरल नहीं है कि जीवन आपको जैसा रखना चाहता है आप वैसे ही बन जाएं। हालाँकि आनंद का सबसे सहज मार्ग तो यही है। इतना सब कहने के पश्चात मेरे आज के लेखन का उद्देश्य यह कतई नहीं कि कुछ समायोजन करने के पश्चात कैसे “प्रसन्न” रहा जाए। आज का विषय आनंद-चित्त होने…read more

प्रसन्नता की मनोदृष्टि

आप के पास जो भी है उस के लिए कृतज्ञ बनें तथा अपने हृदय को प्रसन्नता से प्रकाशित करें। चिंता का बोझ हलका करें और स्वयं को मुक्त करें।

संन्यासी होने के सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यों में से एक है संसार के प्रचंड दुख और कष्ट को निकट से देखना। संभवत: चिकित्सकों व मनोवैज्ञानिकों को भी ऐसा ही अनुभव होता है। कभी-कभी जब मैं लोगों से मिलता हूँ तो मुझे समझ आता है कि क्यों बुद्ध ने कहा कि जीवन दुखकारी है और क्यों गुरू नानक ने कहा था कि सम्पूर्ण संसार पीड़ा का अनुभव कर रहा है। मैं हर प्रकार के व्यक्तियों से मिलता हूँ। उनमें वे भी हैं जो बड़ी कठिनाई से अपनी आजीविका कमा पाते हैं और…read more

सबल बनो

तेज हवाओं के चलने पर एक मजबूत वृक्ष भी हिलता डुलता है। सबल होने का यह अर्थ नहीं की आप कभी कोई भावना व्यक्त न करें।

मैं 11 वर्ष का था और अपने पिताजी के साथ रेल में यात्रा कर रहा था। हमें एक दूसरे के पास बैठने की जगह नहीं मिल पाई, परंतु हम खुश थे कि कम से कम हमें रिज़र्वेशन तो मिल गई। मैं खिड़की के पास बैठ गया और दूसरी ओर की सीट पर चालीस के करीब पहुँचती उम्र के एक सज्जन बैठे थे। उन्होंने लाल टी-शर्ट, जीन्स व एक स्पोर्टी घड़ी पहनी हुई थी। हमें एक लंबा समय साथ बिताना था (24 घंटे से अधिक)। तो, उन्होंने मेरे साथ वार्तालाप आरंभ…read more

1