ॐ स्वामी

किसे प्रसन्न रखा जाये

दो व्यक्ति आपस में प्रेम करें, साथ-साथ रहें तथापि वे पृथक मार्गों के पथिक हों – ऐसा अवश्य हो सकता है। प्रेम का अर्थ पूरा समय दूसरे को प्रसन्न रखना ही नहीं होता।

एक दिन एक युवक ने अति सादगीपूर्ण ढंग से मुझसे पूछा, “मुझे किस को प्रसन्न रखना चाहिए? यहाँ तो बहुत से लोग हैं – मेरे माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी, बच्चे, बॉस एवं कई अन्य। इनमें से मैं किसका चयन करूँ, अथवा तो क्या मैं प्रयत्न करूँ व सभी को खुश रखूँ?” “आप सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को तो भूल गए”, मैंने कहा। “ईश्वर?” “नहीं, आप स्वयं।” अंतत:, दैनिक जीवन की खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि मैं स्वयं को एवं दूसरों को कितना प्रसन्न रख पाता हूँ, और दोनों में…read more

डेफ़ोडिल फूल का सिद्धांत

प्रस्तुत है एक अत्यंत सुंदर कहानी जिसमें जीवन किस प्रकार जिया जाए इस विषय पर प्रेरणाप्रद संदेश निहित है।

प्रत्येक भाषा में कुछ ऐसे अनूठे शब्द होते हैं, जिनका अनुवाद करना संभव नहीं है। जापानी भाषा में ऐसा ही एक शब्द है “वब सबी”। यह मात्र एक शब्द नहीं, वरन एक दर्शन है। यह जीवन जीने का एक मार्ग है। सीधे सीधे कहा जाए तो इसका अर्थ है जीवन की अपूर्णताओं के बीच सुंदरता को खोजना तथा उन्नति व आयु के प्राकृतिक काल चक्र के साथ गरिमापूर्ण विधि से आगे बढ़ते जाना। किंतु ऐसा जीवन जिसमें आप गरिमामय ही नहीं वरन् साथ ही साथ सुखी, कृतज्ञ व शांत भी…read more