किसे प्रसन्न रखा जाये

दो व्यक्ति आपस में प्रेम करें, साथ-साथ रहें तथापि वे पृथक मार्गों के पथिक हों – ऐसा अवश्य हो सकता है। प्रेम का अर्थ पूरा समय दूसरे को प्रसन्न रखना ही नहीं होता।

एक दिन एक युवक ने अति सादगीपूर्ण ढंग से मुझसे पूछा, “मुझे किस को प्रसन्न रखना चाहिए? यहाँ तो बहुत से लोग हैं – मेरे माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी, बच्चे, बॉस एवं कई अन्य। इनमें से मैं किसका चयन करूँ, अथवा तो क्या मैं प्रयत्न करूँ व सभी को खुश रखूँ?” “आप सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को तो भूल गए”, मैंने कहा। “ईश्वर?” “नहीं, आप स्वयं।” अंतत:, दैनिक जीवन की खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि मैं स्वयं को एवं दूसरों को कितना प्रसन्न रख पाता हूँ, और दोनों में…read more