एक बार एक सम्पन्न किसान, अति आशान्वित हो, बुद्ध के पास पहुंचा। उसने महात्मा के सम्मुख साष्टांग प्रणाम किया व उनके आशीर्वाद की आकांशा की। बुद्ध ने हाथ उठा कर उसे आशीर्वाद दिया।

“हे परम पूजनीय!”, किसान बोला, “मैं एक घोर विपदा में फंसा हूँ और मैं जानता हूँ कि केवल आप ही मेरी सहायता कर सकते हैं।”
बुद्ध शांत रहे और वह व्यक्ति बताने लगा कि उसका आवारा पुत्र उसे परेशान कर रहा है और, यह भी कि उसे अपनी पत्नी पर अत्यंत क्रोध आ रहा है क्योंकि वह भी उसका साथ न देकर, अपने पुत्र का साथ देती है।

वह व्यक्ति बोला, “आप कुछ ऐसा कर दो कि उनके हृदय परिवर्तित हो जाएँ व उन्हें एहसास हो कि मैं उनके लिए कितना कुछ कर रहा हूँ।”
“मैं तुम्हारी इस समस्या को नहीं सुलझा सकता” बुद्ध ने कहा और पुनः ध्यानावस्था में नेत्र मूँद लिए।

किसान ने बुद्ध को बताया कि वह किस प्रकार से अपनी फसल को लेकर चिंतित था, चूंकि उस बार मानसून कुछ असामान्य लग रहा था व बंदर उसके खेतों को नष्ट कर रहे थे।
“मैं इसमें भी तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता,” बुद्ध ने शांत स्वर में कहा।

बुद्ध की दिव्य-शक्तियों में आस्था रखे, अभी भी आशावान हो, उसने बताया कि बहुत से लोगों ने उससे धन उधार लिया हुआ है और अब उस धन को प्राप्त करने में उसे अति कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। और यह कि, उसने भी अन्य साहूकारों से उधार लिया हुआ है। उसने बुद्ध से पूछा कि क्या वह उसे कोई समाधान अथवा तावीज दे सकते हैं।
“अ अ …..,” बुद्ध बोले, “मैं तुम्हारी यह समस्या नहीं सुलझा सकता।”

“तब आप किस काम के हैं?”, वह व्यक्ति चिल्लाया। “हर कोई कहता है कि आप आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष हैं, और, यहाँ आप मेरी एक भी समस्या नहीं सुलझा सकते। क्या आप वास्तव में कुछ नहीं कर सकते? मैं अपने परेशानियों से भरे जीवन से थक चुका हूँ।”
“देखो”, बुद्ध ने धैर्यपूर्वक कहा, मानो उन्होंने उस व्यक्ति की निंदा गाथा सुनी ही न हो, “जीवन में हर समय आपके समक्ष सदा 84 समस्याएँ उपस्थित होंगी। 84वीं ही समाधान की कुंजी है। यदि आप 84वीं समस्या सुलझा लो तो पहले की 83 स्वतः सुलझ जाएंगी।”
तो आप मेरी 84 वीं समस्या ही सुलझा दें,” वह व्यक्ति पुनः विनम्र होते हुए बोला। “और ऐसा मैं कैसे करूँ?” उसने पूछा।
“पहले हमें तुम्हारी 84 वीं समस्या की पहचान करनी होगी।”
“तो मेरी 84 वीं समस्या क्या है?”
बुद्ध मुस्कुराए और व्यक्ति के नेत्रों में गहराई से देखने लगे, वे नेत्र जो लालसा, भ्रम, व चिंता से परिपूर्ण थे।

“तुम्हारी 84 वीं समस्या है ………” बुद्ध ने कहा और कुछ विराम लिया, “…और बोले, “तुम पहली 83 समस्याओं से छुटकारा पाना चाहते हो। यदि तुम समझ लो कि जीवन कभी समस्याओं से रहित होता ही नहीं, तो वह इतना बुरा नहीं लगेगा।”
हालांकि उस व्यक्ति को अपनी आशानुसार हल नहीं मिला, तथापि बुद्ध की करुणामयी दृष्टि से उसे शांति का अनुभव हुआ, भले ही अस्थाई रूप से।
बुद्ध ने यह कहते हुए वार्ता समाप्त की – “विनम्र बनो, उद्दात बनो। जीवन को उसके उस रूप से आगे देखना सीखो जैसा ‘आप’ उसे देखना चाहते हो।”

मुझे ऐसी सहसत्रों ई-मेल प्राप्त होती हैं जिनमें लोग आशा करते हैं कि मैं उनकी ऋणमुक्त होने में सहायता कर सकता हूँ, अथवा मैं संभवतः उन्हें कुछ ऐसा दूँगा जिससे सहसा उनके सभी रोग दूर हो जाएँगे, या मैं एक शब्द बोलूँगा और उनकी समस्याएँ लुप्त हो जाएंगी, या उनके मन की सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाएंगी। मैं इन समस्याओं में आपकी सहायता नहीं कर सकता। स्वामी केवल शांति का मार्ग दिखाते हैं। मैं आपको केवल यह सिखा सकता हूँ कि किस प्रकार आप “ध्यान” अथवा “भक्ति” के द्वारा अपने अन्तःकरण में परमानंद की प्राप्ति कर सकते हैं। वह भी तभी संभव होगा जब आप स्वयं अपने ऊपर कार्य करने के इच्छुक होंगे व उसके लिए आवश्यक समय देंगे। इसके लिए आवश्यक है कि अहम के कवच को भेदा जाये ताकि आपका वास्तविक “मैं” प्रकट हो सके। जब अहम टूटता है तो पीड़ा होती है, किन्तु इसका तोड़ा जाना अनिवार्य है, तभी उस भावातीत स्थिति के अनुभव की संभावना बनती है।

मैं, अधिक से अधिक, आपके लिए प्रार्थना कर सकता हूँ। और, यदि आपकी श्रद्दा अटूट है, तब संभवतः मैं आपको अपनी सुरक्षा प्रदान कर पाऊँ। किन्तु, इसका अर्थ यह नहीं कि आपके जीवन की 83 समस्याएँ समाप्त हो जाएंगी। एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है – ऐसी किसी भी सुरक्षा का क्या औचित्य, यदि आपकी समस्याएँ समाप्त नहीं होतीं? इसका उत्तर है – कृपा। शरणागत हो कर जिस कृपा का अनुभव आप करते हैं, वह केवल आप ही जान सकते हैं। यह आपको आत्मबल व शांति, दोनों एक साथ प्रदान करती है। यह, वास्तव में, अवर्णनीय है।

क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि जब कोई समस्या अथवा वृतांत आपके विचारों व भावनाओं पर पूर्णतः आच्छादित हो जाता है तो आप को महसूस होता है कि, काश! मेरे जीवन में यह समस्या न आती तो मेरा जीवन सम्पूर्ण होता? यह एक विभ्रम है। क्या आपका जीवन तब सम्पूर्ण था जिस समय यह समस्या आपके जीवन में न थी? संभवतः नहीं। संभावना यह बनती है कि उस समय आप किसी अन्य समस्या से घिरे हुए थे।

एक छोटे से शहर में एक युवा बालक रहता था जिसके बारे में सब सोचते कि वह निरा बुद्धू है, गोबर-गणेश! वे उसकी एक साधारण सी परीक्षा के लिए उसके समक्ष 50 पैसे व एक रुपये के सिक्के रख कर उसे कोई एक उठाने को कहते। लोग यह देख कर रोमांचित होते कि वह सदा 50 पैसे का सिक्का ही उठाता था। वे उसका परिहास करते व उसकी अज्ञानता पर हँसते।

एक दिन एक व्यक्ति ये उस बालक से कहा, “यह कोई खेल नहीं जो सब तुम्हारे साथ खेलते हैं। सब तुम्हें मूर्ख बनाते हैं और तुम पर हँसते हैं। क्या तुम जानते नहीं कि एक रुपया 50 पैसे से दो गुना होता है?”
“महोदय”, बालक बोला, “क्या आप नहीं जानते कि जिस दिन मैंने एक रुपये का सिक्का उठा लिया, वे मुझे सिक्के देना ही छोड़ देंगे?”

जिस दिन आप जीवन के साथ चतुराई से पेश आना आरंभ कर देंगे, खेल समाप्त हो जाएगा; आप अपने ही जाल में फंस जाएंगे। यह बहुत जटिल हो जाएगी। इससे बेहतर होगा कि आप सुखपूर्वक रहें। जीवन हमारे आशय व कार्यसूची के आरपार देख लेता है। हालांकि लगता ऐसा है कि “मेरा जीवन” केवल मेरा ही जीवन है, तथापि, वास्तविकता यह है कि किसी का भी जीवन उस अथाह, अनादि, अनंत परमसत्ता का मात्र एक अत्यल्प अंश है। आप दूसरों के साथ, ब्रह्मांड के साथ, जितना अधिक सद्भावपूर्वक रहते हैं, उतनी अधिक आप अन्तर्मन में विश्रांति अनुभव कर पाते हैं।

कभी कभी बहुत अधिक की चाह में आप वह भी खो देते हैं जो आपको प्राप्त है। यदि आप पूरा रुपया ही स्वयं के लिए चाहेंगे तो शीघ्र ही जीवन आपको दोनों ही प्रदान करना रोक देगा – 50 पैसे भी और एक रुपया भी। जीवन एक समस्या नहीं है, न ही समस्याओं का संग्रह। यह एक मित्र है। इसके साथ वैसा ही व्यवहार करें। कभी कभी आपकी इच्छा पासता खाने की होती है, किन्तु आपका मित्र थाई-रेड करी खाना चाहता है। मैं समझता हूँ यह उचित है…….। कभी आप असहमत होते हैं, तो कभी सब कुछ आपके अनुसार नहीं होता। यह भी उचित ही है। आप तब भी बिना एक दूसरे के प्रति कोई राय बनाए, साथ साथ ही रहते हैं। मित्रता इसी को तो कहते हैं; जीवन इसी को कहते हैं। इसके साथ मित्रता रखें।

जीवन से सीखते चलें; इसे आशाविहीन, स्थिर न होने दें।

शांति।
स्वामी