एक बार बुद्ध अपने नौ भिक्षु-शिष्यों सहित नदी के किनारे चले जा रहे थे। अपने शांत व शालीन स्वाभावनुसार वे आनंद के साथ ‘सतर्कतापूर्ण व्यवहार’ विषय पर वार्तालाप कर रहे थे कि अचानक लगभग सभी भिक्षु रुक गये व नदी के दूसरे तट की ओर अतिविस्मयपूर्वक देखने लगे। वहाँ से एक योगी नदी पार कर इस तट की ओर बढ़ रहा था। साधारण परिस्थिति में इसमें ध्यानाकर्षण का कोई प्रयोजन नहीं था। मुख्य रूप से उस समय जब बुद्ध स्वयं सतर्कता पर व्याख्यान दे रहे हों। किंतु यह योगी नाव में नहीं था, न ही वह तैर कर आ रहा था, वह तो जल के ऊपर चल कर आ रहा था।

भिक्षु स्वयं को नियंत्रित नहीं कर पाए व बुद्ध को टोकते हुए बोले, “प्रभु, आप देख रहे हैं? यह अदभुत चमत्कार है। वह योगी भी एक सिद्ध पुरुष होगा!”

बुद्ध पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और बिना कोई उत्तर दिए वे चलते रहे। आनंद को छोड़ बाकी सब वहीं रुक गये।

जैसे ही वह योगी नदी के इस तट पर पहुँचा, सभी भिक्षु आशीर्वाद पाने हेतु योगी के चरणों में गिर गये।

“हे सिद्ध पुरुष, कृपया हमें बताएँ”, वे बोले, “आपने जल के ऊपर चलने की सिद्धि कैसे प्राप्त की?”
योगी गर्व से फूला न समाया। उन्होंने फिर पूछा, “क्या हम भी आप ही की भाँति जल के ऊपर चल सकते हैं?”
“हाँ, अवश्य” वह बोला, “यदि आप मेरे बताए मार्ग पर २० वर्ष तक पूर्ण अनुशासन में रह कर चलें तो आप भी मेरी तरह जल के ऊपर चल सकते हैं।”
“बीस साल!” सभी एक स्वर में चिल्लाए।

उनका आवेश वहीं थम गया। पूरे बीस वर्ष एक अति संयमी पवित्र जीवन जीने की साधना कौन कर पाएगा? उन्होंने सोचा, निःसंदेह, वह सिद्धि आकर्षक थी किंतु उसके लिए दो दशकों का कठोर अनुशासन! यह बहुत अधिक था। उनमें से दो वहीं रह गये व अन्य भिक्षुओं ने तत्परता से योगी को नमन किया व बुद्ध के पीछे दौड़े। बुद्ध धीमे पग बढ़ाते, शांत चित्त से नाव की ओर जा रहे थे।

“हे भन्ते!” वे बोले, “उस योगी ने कहा कि यदि हम बीस वर्ष तक अथक प्रयास करें तो हम भी जल के ऊपर चल पाएँगे। वह वास्तव में आकर्षक था। किंतु हमने सोचा कि आप अवश्य कोई सुगम मार्ग जानते होंगे।”

बुद्ध क्षण भर को ठहरे, अपनी परिष्कृत निगाह उनके आवेश भरे चेहरों पर डाली, व पुनः आगे बढ़ गये।

“क्या आप हमें नदी के उस पार ले चलेंगे बंधुवर?” उन्होंने नाविक से पूछा।
“जी हाँ”, वह बोला, “किंतु आपको इसका मूल्य चुकाना होगा – मुठ्ठी भर चावल देकर।”

उन्होंने सहमति जताई व नाव में बैठ गये। नाविक चुपचाप नाव चला रहा था, तब नदी के मध्य भाग तक पहुँच कर बुद्ध ने अपना मौन तोड़ा।

“उसका मूल्य केवल इतना है, मेरे आध्यात्मिक पुत्रो”, वे बोले। “उस योगी की बीस वर्ष की गहन साधना का मूल्य मात्र एक मुठ्ठी चावल है।”

भिक्षुओं ने अपने सिर शर्म से झुका लिए। इसलिए नहीं कि वे उस योगी की ओर आकर्षित हुए – वह तो स्वाभाविक था। किंतु इसलिए की मात्र एक साधारण विक्षेप और उन सब ने कितनी सुगमता पूर्वक अपने गुरु का बहिष्कार कर दिया।

“आपको चुनाव करना होता है,” बुद्ध बोले, “भिक्षुओ, आपको जीवन में चयन करने होते हैं। सब कुछ आपके चयन व उसके उपरांत की गई चेष्टाओं पर निर्भर होता है। आप मात्र कुछ व्यक्तियों पर प्रभाव डालने हेतु किसी सिद्धि-प्राप्ति के पीछे लालायित हो सकते हैं, अथवा आप एक उद्देश्यपूर्ण जीवन जीते हुए, संपूर्ण जगत के जीवों के कल्याण में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। यह पूर्णतः आप पर निर्भर है।”
“हमें क्षमा करें तथागत। हम आपके शिष्य कहलाने के योग्य नहीं क्योंकि हमने मात्र एक सिद्धि देखी और उस योगी को भी परम सिद्ध मान लिया।”

बुद्ध अपने मौन में स्थित थे। वे सब नाव से उतरे व आनंद ने नाविक को उसका भुगतान किया – एक मुठ्ठी भर चावल।

हम सब में ऐसे बहुत से शिष्य हैं। हम किसी में मात्र एक गुण देखते हैं और अपने उस विशेष व्यक्ति के सभी गुण भूल जाते हैं जो सदा से हमारे साथ है। चूँकि किसी का एक गुण हमें भा गया अतः हम उसे भी वही ऊँचा स्थान देने को तत्पर हो जाते हैं। ऐसे में हम अपने प्रियजनों के वर्षों के प्रेम, लगाव, देखभाल व सभी स्मृतियों को तुरंत भूल जाते हैं। हम निःस्वार्थी, प्रज्ञ बुद्ध का परित्याग उस व्यक्ति के लिए कर देते हैं जिसकी किसी एक शक्ति ने हमें सम्मोहित कर लिया। कोई पुरुष अथवा स्त्री आपसे शालीनता पूर्वक वार्ता कर ले, आपको कुछ देर के लिए सम्मान दे दे और आप घर जाकर अपने साथी के सम्मुख उसका गुणगान गाने लगते हैं, कि देखिए, वह कितना सभ्य है, आपको भी उसी के अनुरूप आचरण करना चाहिए। ऐसे कह कर हम उनकी वर्षों की मेहनत को मात्र एक मुठ्ठी चावल से तोल देते हैं। उसकी तरह बनो, उसकी तरह पहनो, उसकी तरह खाओ, उसकी तरह कमाओ, अपना व्यवहार उसके जैसा बनाओ, इत्यादि। हममें से अधिकांश उन भिक्षुओं की भाँति, अन्य योगिओं की सिद्धियों से सम्मोहित हो, बुद्ध को उन के अनुरूप बनने को कह रहे हैं।

न केवल शिष्य, हम सब में ही बहुत से योगी भी हैं। वस्तुतः, आज के समय व युग में, सर्वाधिक योगी हैं। किंतु आज वे एक भिन्न स्वरूप में विराजमान हैं। हममें से बहुत से, उस योगी की भाँति, अपना सपूर्ण जीवन मात्र एक मुठ्ठी चावल के मोल समान कार्यों में ही बिता देते हैं। प्रेम के सुमधुर गीत की उपेक्षा करते हुए, अपनी निजी प्रसन्नता का अपमान करते हुए, अपनी भावनात्मक आवश्यकताओं को कुचलते हुए, अपने स्वास्थ्य की भी अवहेलना करते हुए, हम अत्यंत कठिन परिश्रम में व्यस्त हैं – कुछ पाने के लिए, कुछ कहलाने के लिए, कुछ विशेष बनने के लिए। मुझे यह कहने की आज्ञा दें की इसमें से अधिकांश प्रयत्न हम उन लोगों को प्रभावित करने के उद्देश्य से करते हैं जिनका हमारे जीवन में कोई महत्त्व नहीं, जो हमारी लेशमात्र चिंता नहीं करते; उन सब को आकर्षित करने हेतु जिनके लिए कभी भी कुछ प्रचुर हो ही नहीं सकता। दुःख की बात यह है कि हम इतना सब उन प्रियजनों को उपेक्षित करके करते हैं जो वस्तुतः हमारे अस्तित्व की जीवन रेखा हैं।

हम कठिन परिश्रम इसलिए करते हैं ताकि हम प्रसन्न रह सकें व अपनी प्रसन्नता अपने प्रियजनों के साथ बाँट सकें। किंतु उस समय, उस कठिन दौड़ में विजयी होने के मार्ग पर, हम प्रायः यह विस्मृत कर बैठते हैं कि इस का वास्तविक प्रयोजन क्या है! दो लोग आपस में इस उद्देश्य से संबंध बनाते हैं कि दोनो मिलकर जीवन की खुशियाँ एकत्र करेंगे व उन्हें एक दूसरे संग बाँटते हुए जीवन यापन करेंगे। किंतु, जीवन की कटु सत्यता व व्यवहारिकताओं में, वह प्रेम, ओस की बूँद की तरह न जाने कहाँ खो जाता है, अपने पीछे विरोध, विवाद व असामंजस्य की एक निर्जीव लंबी लकीर छोड़ कर!

क्यों प्रेम एक इतनी भ्रामक भावना है? ऐसा क्यों होता है कि वे दो व्यक्ति जो एक दूसरे के बिना जीवन जीने की कल्पना तक नहीं कर पाते थे, वही पूर्ण संबंध-विच्छेद कर लेते हैं? अपनी इस पुस्तक में मैने अपने अभी तक लिखे सभी लेखों के आधार पर, उपरोक्त प्रश्नों को संबोधित किया है।

हम जीवन में प्रायः, उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु कार्यरत रहते हैं, परंतु प्रेम किन्हीं ऊँचे या विशाल तत्वों से नहीं बना होता। इस धरती पर नज़र आने वाली हर एक वस्तु, भले वह विशाल हिमालय हो अथवा एक नन्ही चींटी, सब की संरचना अत्यंत न्यूनतम कोशिकाओं से मिलकर हुई है। प्रेम भी परस्पर स्नेह, आदर, देखभाल व एक दूसरे को प्रोत्साहित करने जैसे नन्हे नन्हे उद्भावों से बनता है व अभिव्यक्त होता है। मैं प्रेम को किस रूप में देखता हूँ, यह जानने के लिए मेरे साथ आएँ। आइए, मिल कर भूसे और बीज को पृथक करें, इस जानकारी के साथ कि पुनः बोए जाने वाले बीज उपभोग योग्य बीजों से भिन्न होते हैं।

कुछ क्षण के लिए रुक कर, थोड़ा विराम लेते हुए, अपने जीवन पर एक पुनर्दृष्टि डालने का यह उपयुक्त अवसर हो सकता है। आशा है कि आपका जीवन-लक्ष्य जो भी है, आप जिस भी उच्च लक्ष्य की प्राप्ति में जी-जान से लगे हैं, उसका मूल्य एक मुठ्ठी चावल से कहीं अधिक है। अथवा ऐसा कि आपको वह सब पाने के लिए इतना घोर परिश्रम, तनाव युक्त जीवनचर्या, प्रतिस्पर्धा की अर्थहीन दौड़ न अपनानी पड़े, जो आप मात्र एक मुठ्ठी चावल के भुगतान से सुगमातापूर्वक प्राप्त कर सकते हों।

कृष्ण ने भी सुदामा को मुठ्ठी भर चावल के बदले संपूर्ण जगत का ऐश्वर्य प्रदान किया था। हालाँकि, उस एक मुठ्ठी चावल ने नहीं, बल्कि उसके पीछे छुपे एक मुठ्ठी प्रेम ने कृष्ण को विवश किया था। सुदामा का मुठ्ठी भर विशुद्ध प्रेम। मात्र इतना ही आवश्यक होता है – मुठ्ठी भर प्रेम – अपने संबंधों के उपवन को सजाने सँवारने हेतु। प्रेम के वे बीज एक दिन यथा समय काटे जाएँगे, व पुनः फलित होने के लिए बोए जाएँगे, दिनों दिन अधिक और अधिक विकसित होने के लिए। यह सब प्रेम की एक फुहार मात्र से प्रारंभ होता है।

कुछ व्यक्तियों के लिए एक मुठ्ठी चावल उनके संपूर्ण जीवन का मूल्य है, उनका संपूर्ण जीवन है। वहीं, कुछ अन्य के लिए, संपूर्ण विश्व का मूल्य मात्र एक मुठ्ठी चावल से अधिक नहीं। यह अपनी अपनी निजी सोच व समझ का विषय है, प्राथमिकता का प्रश्न है, अपना स्वयं का दृष्टिकोण है।

आपकी सोच क्या है?

यह मेरी पुस्तक “मुठ्ठी भर प्रेम” (अ फिस्टफुल ऑफ् लॅव् – A Fistful of Love) का प्राक्कथन है, जिसे जयको पब्लिशिंग हाउस ने प्रकाशित किया है।

आपमें से बहुत से लोगों की यह इच्छा थी कि मेरे साप्ताहिक लेखों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाए ताकि सब उसे अपने समीप रख पाएँ अथवा अपने प्रियजनों को उपहार स्वरूप भेंट कर पाएँ। अब आप ऐसा कर पाएँगे। “मुठ्ठी भर प्रेम” (अ फिस्टफुल ऑफ् लॅव् – A Fistful of Love) इस श्रंखला की प्रथम पुस्तक है। यह प्रेम व आपसी संबंधों इत्यादि पर लिखे गये मेरे पचास लेखों का संग्रह है व विश्वभर में उपलब्ध है। यहाँ क्लिक करें यदि आप भारत में हैं और यहाँ क्लिक करें यदि आप विश्व के किसी अन्य स्थान पर हैं। मुझे आशा है कि आप पुस्तक का आनंद लेंगे।

शांति।
स्वामी