स्वामीजी के शब्दों में उनका वर्णन (अनुवाद):

मेरे पास जो है यह मेरी सफलता नहीं
मैं जो करता हूँ यह मेरा परिचय नहीं
मैं कौन हूँ केवल यही है।
एक महत्वहीन।

मैं गाता हूँ मैं हंसता हूँ
मैं नाचता हूँ मैं थपथपाता हूँ
अनंत ब्रह्माण्ड में एक धूल का कण
एक सूक्ष्म बूंद में एक विशाल सागर
हिमालय की एक धारा
एक स्थिर पर्वत

मैं वह ब्रह्म हूँ।

और आप भी वही हैं।

करुणा मेरा धर्म है और प्रेम मेरी एक मात्र विचारधारा।

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