ॐ स्वामी

समर्पण पर कुछ शब्द

आत्मसमर्पण यह ज्ञान है कि वृक्ष सदैव हरे नहीं रह सकते। आत्मसमर्पण पतझड़ के रंगों में सुंदरता देखने के समान है।

जीवन विचित्र है। जितना अधिक हम सोचते हैं कि हमने इसे समझ लिया है, यह उतना ही रहस्यमय हो जाता है। एक कुशल जादूगर के समान, यह हमें अपनी अकल्पनीय योजनाओं को सफल रूप देने की क्षमता पर अचंभित कर देता है। परंतु जीवन की सभी आश्चर्यजनक वस्तुएं प्रिय नहीं होतीं। कुछ तो नितांत क्रूर हो सकती हैं। जब जीवन अप्रत्याशित प्रहार करता है तब आपकी आंतरिक शक्ति की परीक्षा होती है। उस समय प्रकृति के दिव्य न्यायालय में श्रद्धा व आत्मसमर्पण की पुकार होती है यह देखने के लिये…और पढ़ें

प्रेम की भाषा बोलना

कोई भी इतना सशक्त नहीं कि प्रेम की भाषा का विरोध कर पाये। यह हृदय को भेदते हुए सीधे आत्मा में उतर जाती है।

रोचक बात यह है कि सभी मानवीय सम्बन्धों में, विषेश रूप से सामाजिक एवं व्यक्तिगत, सौहार्द व सद्भाव स्थापित करना मात्र एक साधारण घटक पर निर्भर है। यह भौतिक उपहारों से संबंधित नहीं है, न ही यह आवश्यकताओं की पूर्ति को ले कर है। आप इसके द्वारा किसी का जीवन बिगाड़ भी सकते हैं; अथवा तो उस व्यक्ति के सर्वश्रेष्ठ गुणों को उजागर कर सकते हैं; आप उन्हें प्रोत्साहित कर सकते हैं अथवा तो उनके आत्म-सम्मान को पूरी तरह तहस नहस कर सकते हैं। आपको किस तरह देखा-समझा जाता है,…और पढ़ें

सकारात्मक रहने की कला

सकारात्मक रहना स्वेच्छा का विषय है। सकारात्मक व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक प्रसन्न रहते हैं व प्रायः अधिक सफल भी होते हैं।

एक व्यक्ति था। वह सदा सकारात्मक रहता था। जब कभी कुछ अप्रत्याशित घटना घटती, उसकी प्रतिक्रिया होती, “यह इससे भी अधिक बुरा हो सकता था”। यहाँ तक कि यह सब उसके मित्रों को नाराज करने लगा। जब कोई हर समय पूर्णत: सकारात्मक रहता है तो यह औसत सोच वालों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। एक दिन उसका एक मित्र उसके पास आया और बोला, “कल रात मैंने स्वप्न में देखा कि मैं कार चला रहा था और मेरी भयंकर दुर्घटना हो गई। मेरे शरीर की हर एक…और पढ़ें

सचेत कोलाहल

यदि आप जीवन की सुंदरता का आनंद लेना चाहते हैं तब अनावश्यक बातों का त्याग करना सीखें।

यह एक प्रसिद्ध कहावत है कि हम जन्म के समय अपने साथ इस संसार में कुछ नहीं लाते और मृत्यु के समय हम अपने साथ कुछ नहीं ले जाते हैं। कदाचित हो सकता है। यदि यह पूर्णतः सत्य होता तब यह अच्छा होता। सत्य तो यह है कि ऐसा बहुत कुछ है जिसे हम जन्म के समय अपने साथ लेकर आते हैं और हम अपने साथ बहुत कुछ ले कर जाते हैं। निश्चित रूप से हमारे कर्म हमारे साथ जाते हैं। आप चाहे पुनर्जन्म में विश्वास रखते हों या स्वर्ग…और पढ़ें

प्रतिबिंब – ध्यान में चतुर्थ व्यवधान

जब आप ध्यान में बैठते हैं, व केन्द्रित होने का प्रयास करते हैं, आपके अन्तःकरण में अव्यवस्थित प्रतिबिंबों की बौछार होने लगती है। यह एक व्यवधान है।

लगभग बीस सप्ताह पूर्व, हमने आत्म-रूपान्तरण के मार्ग पर अपनी यात्रा प्रारंभ की। मैंने उल्लेख किया कि आत्म-रूपान्तरण की यात्रा में चार विभिन्न स्तरों पर स्वयं को रूपांतरित करने की प्रक्रिया सम्मिलित होती है, वे हैं – मानसिक, भावनात्मक, नैतिक एवं शारीरिक। सम्पूर्ण शुद्धिकरण, उपरोक्त चारों स्तरों को समझना व पूर्णत: परिवर्तित करना , इनके बिना दिव्यता की उत्कृष्त्तम स्थिति प्राप्त करना असंभव है। मैंने अपने लेख मानसिक परिष्कार से आरंभ किए। हमने आपकी एकाग्रता, संकल्प शक्ति व ज्ञान को सशक्त करने की विभिन्न प्रक्रियाओं की विवेचना की। ध्यान में…और पढ़ें

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