ॐ स्वामी

नियति या स्वेच्छा

क्या भाग्य नियंत्रित करता है कि आप कहाँ पहुँचेंगे या आपकी स्वतंत्र इच्छा शक्ति?

क्या सब कुछ पूर्वनिर्धारित है या हमारे पास स्वतंत्र इच्छा शक्ति है? अंततः यदि सब कुछ पूर्वनिर्धारित है तब हम अपने स्वप्नों को पूर्ण करने हेतु कोई प्रयास क्यों करें और यदि यह हमारे हाथों में है, तब हम जीवन में असहाय और अप्रत्याशित परिस्थितियों के माध्यम से क्यों जाते हैं? मात्र कुछ दिनों पूर्व आश्रम के वार्षिकोत्सव के पर्यंत मैंने एक वक्ता द्वारा कही गयी सुंदर कथा सुनी जिसमें देवी माँ की महिमा का वर्णन किया गया था। ४५० से भी अधिक वर्ष पूर्व, भारत में मल्लुक दास नामक…read more

जीवन का उद्देश्य

जिस प्रकार एक नदिया, सागर में विलीन होने से पूर्व, इधर-उधर मार्ग बनाते व आगे बढ़ते हुए, चहुं ओर जीवन्तता बहाती चलती है; हमारे जीवन का उद्देश्य भी उसी के समान है – एक सम्पूर्ण जीवन जीना व अपनी ही भव्यता में विलीन हो जाना।

मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मैं अपना उद्देश्य कैसे ढूंढू? ये दो प्रश्न बहुधा मुझसे उन लोगों द्वारा पूछे जाते हैं जिनके जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा होता है। जब आपका पेट भी वैसे ही भरा होता है जैसे आपका बैंक बैलेन्स, और आपको नींद नहीं आ रही होती, तब स्वाभाविक ही आप बैठ कर सोचते हैं (अथवा चिंता करते हैं) कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है। बहुत हद तक ऐसा प्रतीत होता है मानो हम जीवन में ऐसा कुछ चाहते हैं जो हमें विचारमग्न व…read more

अनित्यता

जो कुछ भी इंद्रियगोचर है, उसमें से कुछ भी स्थायी नहीं। यह मेघ, चंद्रमा, तारागण, हमारा ग्रह, सब कुछ निरंतर परिवर्तित हो रहा है।

कभी कभी मैं आश्चर्यचकित होता हूँ कि प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति हम इतने अनिच्छुक क्यों रहते हैं? कुछ भी ऐसा जो हमारी अपेक्षाओं के साथ तारतम्य नहीं रखता, हम उसे दुःख की संज्ञा दे देते हैं। चाहे वह कोई कठिन व्यक्ति हो, अथवा परिस्थिति या समस्या हो, जो कुछ भी हमें बेचैन करने की क्षमता रखता है वह हमारे लिए अवांछनीय हो जाता है। अतिशय तीव्रता से। हम उससे अपना पीछा छुड़ाना चाहते हैं। इच्छा रखना, स्वभावतः, कोई समस्या नहीं है, चूँकि हमारे भौतिक अथवा आध्यात्मिक – किसी भी प्रकार…read more

निर्भीकता का बीज

उचित पालन-पोषण द्वारा एक बालक को जीवन में सत्यवादी व निर्भीक बनने में सहायता कर पाना संभव है।

यह मई १९८६ का समय था। मैं ६ १/२ वर्ष का था व अभी अभी अपने विद्यालय की द्वितीय कक्षा में उन्नीत हुआ था। सब कुछ बहुत रसहीन था। मेरी कक्षा के सभी पीरियड एक ही अध्यापिका लेती थीं। प्रतिदिन घर जा कर मुझे वह सब जो कक्षा में हर विषय में पढ़ाया जाता, वह पुनः लिखना होता था। यही हमारा गृहकार्य होता था। हर दिन, प्रतिदिन। उदाहरण स्वरूप, यदि मैंने कक्षा में गणित के ५ प्रश्न व अंग्रेजी में ५ वाक्य किए हैं तो मुझे घर जाकर वैसे का…read more

जीवन के चार सत्य

मानव अस्तित्व के चार सत्यों पर प्रस्तुत है मेरा संस्करण

“मेरी ईश्वर से मात्र एक इच्छा है”, एक नवयुवती ने मुझसे कहा, “क्षमा। क्षमा के अतिरिक्त मेरी कोई अभिलाषा नहीं।” “मेरे पिता एच-आई-वी पॉजिटिव थे और उनके अंतिम दिन अत्यंत दुखदायी थे।” उस नवयुवती ने आगे सुनाया “वे हिल भी नहीं सकते थे और उन्हें निरंतर देखभाल की आवश्यकता थी। मुझे उनसे इतनी घृणा हो गयी थी कि मैंने उनकी पूर्णतया उपेक्षा की। मेरी माँ परिवार के लिये रोटी कमाने वालीं अकेली सदस्य थीं और वे सारा समय घर पर नहीं रह सकती थीं। मैं अपने पिता की देखभाल कर…read more

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