ॐ स्वामी

त्राटक – स्थिर दृष्टि का अभ्यास

त्राटक, अथवा स्थिर दृष्टि का अभ्यास, अपनी दृष्टि को परिष्कृत व स्थिर करने की कला है। प्रत्येक ध्यानयोगी के लिए यह एक अनिवार्य गुण है।

एकनिष्ठ एकाग्रता बनाने हेतु यह अंतिम अभ्यास है। विगत दो लेखों में मैंने श्रवण – सुनने का अभ्यास, एवं एकाग्रता – केन्द्रीकरण का अभ्यास, इन दो पर चर्चा की; दोनों की संरचना आपके द्वारा एकनिष्ठ एकाग्रता बनाने में सहायतार्थ की गई है। इस लेख में मैं त्राटक – स्थिर दृष्टि, के अभ्यास पर प्रकाश डालूँगा। अपनी दृष्टि किसी एक वस्तु पर स्थिर करने का ढंग त्राटक कहलाता है। वास्तविक ध्यानावस्था प्राप्त करने हेतु अपनी दृष्टि को स्थिर कर पाने की क्षमता अत्यंत आवश्यक है। यदि एक ध्यानयोगी अपने नेत्रों को…और पढ़ें

कैसे आकृष्ट न करें

जीवन प्रतिकूलता एवं विरोधाभास से भरा है। प्रकाश और अंधकार, धूप और हिम-पात शांतिपूर्वक मिल जुल कर रहते हैं। ध्यान दें।

कुछ दिनों पहले किसी ने, जो किसी संगठन की सीढ़ी के सबसे निम्न सोपान पर था, मुझे बताया कि कार्यस्थल पर अन्य व्यक्तियों के साथ उसका दिन सर्वदा दुष्कर रहता है। “ऐसा प्रतीत होता है कि मैं सदैव अपने विरोधियों को आकर्षित करता हूँ।” उसने कहा “मुझे कोई पसंद नहीं करता।” “किंतु एक दिन” वह बोला “मैंने रेडियो पर कुछ सुंदर सुना! उसमें कहा गया था ‘नौकरी है तो नाराज़गी क्यों?’ इस एक बात ने मेरे सम्पूर्ण दृष्टिकोण को परिवर्तित कर दिया और फिर मैंने इस बात की परवाह करनी…और पढ़ें

श्रवण – सुनने का अभ्यास

सही सुनने के लिए आवश्यक है कि आप वर्तमान क्षण में पूर्ण रूप से सजग हों। और वर्तमान में जीना तत्काल आपको सागर की भांति शांत बना देता है।

गत लेख में मैंने किसी एक वस्तु पर केन्द्रित हो कर एकाग्रता विकसित करने के अभ्यास का वर्णन किया था। आप में से वे सब जिनकी जीवन शैली अति-व्यस्ततापूर्ण है, उनके लिए संभवतः प्रतिदिन ३० मिनट निकाल पाना भी कठिन हो। हालांकि, यदि आप मन बना लें तो अवश्य ही आप समय भी निकाल पाएंगे। इस लेख में मैं श्रवण के अभ्यास पर विस्तार से प्रकाश डालूँगा। श्रवण – संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है – सुनना। श्रवण का अभ्यास आपकी एकाग्रता बढ़ाने का एक साधारण व प्रभावशाली मार्ग…और पढ़ें

स्वतन्त्रता का मूल्य

वास्तविक स्वतन्त्रता, उतावलेपन से दायित्व की दिशा में प्रगति है। इसका अर्थ है – अपने कृत्यों के परिणाम के प्रति सजग रहना।

भीतर गहराई से हम स्वतंत्र प्राणी हैं। लगभग। जन्म के समय हमारी स्वतन्त्रता का बोध कराने के लिए, हमें बंधन मुक्त करने को नाभि की नाड़ भी काट दी जाती है, , इसी तथ्य को दर्शाते हुए कि हमारा मूल संबंध स्वयं से होता है, न कि अन्यों से। कहीं न कहीं, उस प्रेम की खोज के दौरान भी जो कि हमारा सहारा बन सके, वास्तव में हम स्वतन्त्रता ही ढूंढ रहे होते हैं। किसी संबंध में हम जितनी अधिक स्वतन्त्रता अनुभव कर पाते हैं, उतना अधिक हम पूर्णता की…और पढ़ें

प्रसन्नता का रहस्य

कभी कभी प्रसन्नता की गहन अनुभूति प्रवाह में न मिल कर निष्क्रियता में मिलती है, जब जीवन आपको चुनौती देता है।

जीवन का हर दिन मंदगति व सुस्त रूप से काटते हुए, अंततः मैं क्या कर रहा हूँ? प्रत्येक विचारपूर्ण व्यक्ति के जीवन में यह प्रश्न अनिवार्य है। इसे आप अस्तित्ववाद अथवा अधेड़ आयु संबंधी संकट काल या फिर चाहे जो कहें। यदि आपने अपना जीवन पुस्तक में लिखे गए नियमों के अनुसार जिया है और दूसरों की अथवा स्वयं की सहायता के लिए सभी कुछ किया है तो यह अवस्था अवश्यंभावी है। अपने जीवन काल में कभी न कभी हर समझदार व्यक्ति इस शून्यता की भावना का शिकार अवश्य होता…और पढ़ें

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