ॐ स्वामी

जीवन का उद्देश्य

जिस प्रकार एक नदिया, सागर में विलीन होने से पूर्व, इधर-उधर मार्ग बनाते व आगे बढ़ते हुए, चहुं ओर जीवन्तता बहाती चलती है; हमारे जीवन का उद्देश्य भी उसी के समान है – एक सम्पूर्ण जीवन जीना व अपनी ही भव्यता में विलीन हो जाना।

मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मैं अपना उद्देश्य कैसे ढूंढू? ये दो प्रश्न बहुधा मुझसे उन लोगों द्वारा पूछे जाते हैं जिनके जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा होता है। जब आपका पेट भी वैसे ही भरा होता है जैसे आपका बैंक बैलेन्स, और आपको नींद नहीं आ रही होती, तब स्वाभाविक ही आप बैठ कर सोचते हैं (अथवा चिंता करते हैं) कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है। बहुत हद तक ऐसा प्रतीत होता है मानो हम जीवन में ऐसा कुछ चाहते हैं जो हमें विचारमग्न व…read more

अनित्यता

जो कुछ भी इंद्रियगोचर है, उसमें से कुछ भी स्थायी नहीं। यह मेघ, चंद्रमा, तारागण, हमारा ग्रह, सब कुछ निरंतर परिवर्तित हो रहा है।

कभी कभी मैं आश्चर्यचकित होता हूँ कि प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति हम इतने अनिच्छुक क्यों रहते हैं? कुछ भी ऐसा जो हमारी अपेक्षाओं के साथ तारतम्य नहीं रखता, हम उसे दुःख की संज्ञा दे देते हैं। चाहे वह कोई कठिन व्यक्ति हो, अथवा परिस्थिति या समस्या हो, जो कुछ भी हमें बेचैन करने की क्षमता रखता है वह हमारे लिए अवांछनीय हो जाता है। अतिशय तीव्रता से। हम उससे अपना पीछा छुड़ाना चाहते हैं। इच्छा रखना, स्वभावतः, कोई समस्या नहीं है, चूँकि हमारे भौतिक अथवा आध्यात्मिक – किसी भी प्रकार…read more

आखिर मैं ही क्यों?

अच्छे व्यक्तियों को क्यों कष्ट प्राप्त होता है या वे उस पीड़ा से क्यों गुज़रते हैं जिसके वे योग्य नहीं?

आखिर मैं ही क्यों? मुझे आज तक ऐसा कोई नहीं मिला जिसने अपने जीवन में कभी न कभी यह प्रश्न न पूछा हो। अधिकांश व्यक्ति जो अपनी दुखद गाथा लेकर मेरे पास आते हैं वे पूछते हैं, “आखिर यह मेरे साथ क्यों हो रहा है?” यह एक स्वभाविक प्रश्न है। हम सभी ने इस विषय पर सोचा है। मैं आपसे एक छोटी सी कहानी साझा करता हूँ। आर्थर ऐश (१९४३-९३) एक उभरते टेनिस खिलाड़ी थे जिनमें असीम क्षमता थी। अपने करियर के ३३ ख़िताबों के साथ, जिनमें ३ ग्रैंड स्लैम…read more

निर्भीकता का बीज

उचित पालन-पोषण द्वारा एक बालक को जीवन में सत्यवादी व निर्भीक बनने में सहायता कर पाना संभव है।

यह मई १९८६ का समय था। मैं ६ १/२ वर्ष का था व अभी अभी अपने विद्यालय की द्वितीय कक्षा में उन्नीत हुआ था। सब कुछ बहुत रसहीन था। मेरी कक्षा के सभी पीरियड एक ही अध्यापिका लेती थीं। प्रतिदिन घर जा कर मुझे वह सब जो कक्षा में हर विषय में पढ़ाया जाता, वह पुनः लिखना होता था। यही हमारा गृहकार्य होता था। हर दिन, प्रतिदिन। उदाहरण स्वरूप, यदि मैंने कक्षा में गणित के ५ प्रश्न व अंग्रेजी में ५ वाक्य किए हैं तो मुझे घर जाकर वैसे का…read more

जब आपके शब्द कष्ट पहुँचा सकते हों

क्या करें यदि आपकी करुणा प्राप्तकर्ता के विकास के लिए प्रतिकूल हो? आप आनंदप्रद होने या लाभप्रद होने के बीच में चुनाव कैसे करते हैं?

महान ज्ञानी चाणक्य सर्वोकृष्ट विचारक थे और भारत के अत्यंत शक्तिशाली राजाओं में से एक, चंद्रगुप्त मौर्य (३२१-२९७ ई-पू), के मुख्य सलाहकार थे। वास्तविकता में चाणक्य मात्र एक विश्वसनीय सलाहकार ही नहीं थे। क्योंकि उन्होंने चंद्रगुप्त को, जब चंद्रगुप्त मात्र छोटे बच्चे थे, ले कर, प्रशिक्षित कर, उन्हें शासक बना दिया था। वह एक बार नवोदित राजा को सलाह दे रहे थे जब उनमें निम्नलिखित वार्तालाप हुआ। “एक राजा का जीवन, त्यागपूर्ण जीवन है। उसे दूसरों के लिए जीना चाहिए”। फिर चाणक्य ने सूर्य की ओर संकेत करते हुए कहा…read more