ॐ स्वामी

वू – वे : अच्छी चीजों को होने देना

ताओ की एक अति सुंदर धारणा है – वू–वे, जो दर्शाता है कि किस प्रकार यदा कदा पूर्णत: कार्य विमुख हो जाना ही सबसे उत्तम कार्य होता है। एवं, एक घोषणा …

युआन साम्राज्य काल में चीन के सम्राट स्वयं का एक चित्र बनवाने के इच्छुक थे। “मैं अपने आज तक बने किसी भी चित्र से पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हूँ।” उनने चित्रकारों के एक बड़े समूह को संबोधित किया। “मेरा एक ऐसा चित्र बनाओ जिसमें मेरे सूक्ष्मतम हाव-भाव भी दर्शाये गए हों – मेरा प्रतिरूप।” सम्राट प्रतिदिन दो घंटे के लिए बैठते और अति कुशल चित्रकार उनका अवलोकन करते, व भिन्न भिन्न कोण लेकर चित्र चित्रांकित करते । पूर्ण समर्पण एवं सतर्कतापूर्वक वे सब अपने अपने कैनवस पर पेंसिल व…read more

ॐ स्वामी का मार्ग

प्रस्तुत है अपने चारों ओर की अफवाहों, गप्पबाजी एवं आलोचना से कैसे निपटा जाये – इस पर मेरा दृष्टिकोण।

हाल ही में मुझे उन सब लोगों से, जो मेरे लिए चिंतित हैं, ढेरों ई-मेल प्राप्त हुए। उनमें से कुछ दुखी थे, कुछ हैरान-परेशान थे व कुछ तो अत्यधिक क्रोध में थे (मुझ पर नहीं)। कारण? अपने उस प्रिय व्यक्ति को ले कर सुनी कुछ बेबुनियाद अफवाहें, जिसे वे अतिशय प्रेम करते हैं व अपना पथ-प्रदर्शक मानते हैं – ओम स्वामी; इस संदर्भ में वह मैं ही हूँ। वे गप्पबाजों को पलट कर जवाब देना चाहते थे। इसने मुझे बुद्ध के जीवन की एक कहानी स्मरण करवा दी। ऐसा कहा…read more

प्रसन्नता का रहस्य

कभी कभी प्रसन्नता की गहन अनुभूति प्रवाह में न मिल कर निष्क्रियता में मिलती है, जब जीवन आपको चुनौती देता है।

जीवन का हर दिन मंदगति व सुस्त रूप से काटते हुए, अंततः मैं क्या कर रहा हूँ? प्रत्येक विचारपूर्ण व्यक्ति के जीवन में यह प्रश्न अनिवार्य है। इसे आप अस्तित्ववाद अथवा अधेड़ आयु संबंधी संकट काल या फिर चाहे जो कहें। यदि आपने अपना जीवन पुस्तक में लिखे गए नियमों के अनुसार जिया है और दूसरों की अथवा स्वयं की सहायता के लिए सभी कुछ किया है तो यह अवस्था अवश्यंभावी है। अपने जीवन काल में कभी न कभी हर समझदार व्यक्ति इस शून्यता की भावना का शिकार अवश्य होता…read more

अपने पश्चाताप के भाव पीछे छोड़ते हुए….

समय-चक्र की अविराम गति में ही बसते हैं हमारे जीवन के सुंदर पल।

एक बार एक महिला, जो एक सामाजिक कार्यकर्ता थी, वह लोगों को मदिरापान की बुरी लत से छुटकारा पाने में सहायता किया करती थी। उसका एक छोटा सा शहर था, और जब भी वह किसी को मदिरापान करते सुनती तो तत्काल अन्य लोगों के एक छोटे समूह को ले वहाँ पहुँच जाती, ताकि वह उस व्यक्ति से बातचीत कर मदिरा के भयावह परिणामों से अवगत करा सके। उस क्षेत्र में मदिरा पीने वालों की संख्या वास्तव में कम हो गई, चूंकि कोई भी उस महिला का सामना नहीं करना चाहता था।…read more

जीवन यात्रा

एक दार्शनिक कविता से प्रेरित होकर चिर-प्रसन्नता के मूल पर प्रस्तुत हैं मेरे विचार…

एक दिन संयोगवश मैंने कोरी मुलर की वेबसाइट (यहाँ) पर एक सुंदर कविता की व्याख्या पढ़ी। हालाँकि उसका शीर्षक “दो भाई” था किंतु उसे सरलता से “मनुष्य के अस्तित्व का सत्य” कहा जा सकता है। मुझे उस कविता में इतनी गहराई लगी कि एक पल के लिये मैंने आज के पोस्ट में केवल उस कविता को ही साझा करने का विचार किया। बिना किसी टिप्पणी या मेरे अपने विचारों के। प्रस्तुत है वह कविता – एक पुराने पेड़ के नीचे दो पुत्र पैदा हुए प्यार से स्वतंत्रता से दोनों साथ-…read more